दो रोटी की दरकार (कविता)

भीड़भरे उस हाल के

गहमागहमी माहौल में

गूंजती थी छोटू की पुकार

छोटू के डगमग पांव

डोलते हुए चकरघिन्नी सा 

पहुंचता था सबके पास

उसके पास होता था

कभी जग-गिलास

कभी केतली-कुल्हड़

कभी स्वाद वाली प्लेटें 

भागमभाग के दौर में

कैसे ठड़ी पड़ जाती है 

क्षुधा से तिलमिलाती

उसके भूख की ज्वाला

वह कह नहीं पाता

उसे भी दरकार है 

दो रोटी की

जिसे खाकर मिटाता वह

अपने भूख की बेचैनी

वह फिर भी नहीं रुकता

दौड़ता है सबके पास

पोछता है पसीना

अपने ही गमछे से

ऐसे में भी वहां बैठे लोगों में

सोच नहीं बनता है

जो उसे देख सकें

जो सोच सकें कि

वह है पालनहारा 

अपने परिवार का

वह है रखवाला 

अपने भाई-बहन का

लाठी है बूढ़े बाप का

और राजदुलारा है 

अपनी मां का।।।।


1 टिप्पणी:

Unknown ने कहा…

Heart touching lines