मैं-तुम तुम-मैं (कविता)

मैं तुम नहीं बन सकती
तुम मैं नहीं बन सकते
तो क्यों नहीं
मैं मैं ही रहूँ
तुम तुम ही रहो
दोनों के अस्तित्व का
अपना-अपना हो महत्व
समरसता के भाव में
न हो कोई छेड़छाड़
पर एकाकार होने के लिए
जीवन डगर पर
साथ चलने के लिए
समझौतों के
मूक आह्वाहन से
मैं-तुम बनकर
तुम-मैं बनकर 
खुशियों का रंग खिलाते हुए
एक नया संसार बनायें हम।।।


17.04.2022.
रविवार



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