चकरघिन्नी (कविता)

चार बच्चों की 

थी, वह माँ

छोटे से ठिकाने में 

थी पति के साथ 

करती बेपनाह प्यार

बच्चों को एक समान

सहेजती थी सबको 

आँचल के छाँव में

बच्चों के हित में

डटी रहती थी हमेशा

बच्चे बनें, उभरते सितारे 

उज्जवल भविष्य के साथ

बन जाती थी चकरघिन्नी  

बच्चों के इशारों पर

बनके चकरघिन्नी 

हो जाती थी बेहाल 

पर ये बेहाली भी

उन्हें था स्वीकार

क्योंकि उनमें था 

अति मनोबल व उत्साह

बड़े हो गये बच्चे

तो बढ़ गया परिवार 

फिर हो गई उनकी

कुटिया भी चार

माँ तो वही थी

पर बदल गए हालात

अब वे हो गई 

बूढ़ी, अशक्त व बेहाल

मजबूरी है बहुत 

फिर भी नहीं करती इंकार  

चारों घरों में आज भी

डोलती है उंगलियों पर

घुमती हुई चकरघिन्नी।

बनके चकरघिन्नी।।।

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