दो कविताएं (बेरोजगारी और हौसले की उड़ान )

आज के माहौल में बेरोजगारी एक ज्वलंत समस्या है। जो चलती हुई जिंदगी के राह में रोड़ा अटका देती है। ऐसे भुक्तभोगियों के कष्ट को महसूस करने के कारण कविता 'बेरोजगारी' का सृजन हो गया, पर जिंदगी रुकने का नाम तो होता नहीं है। अतः बेरोजगारी की समस्या से निजात पाना ही जिंदगी का उद्देश्य होना चाहिए। अतः इसी सकारात्मक सोच को नया आयाम देने के लिए  मैंने दूसरी कविता 'हौसले की उड़ान' का सृजन किया।




अतः मेरी दोनों कविताओं को एक साथ पढ़कर ही कविता का विश्लेषण करें।

बेरोजगारी (कविता)
परिंदे सी चाहत 
थी उड़ान भरने की
गगन में विचरते हुए
चाँद तक पहुँचने की
काबिलियत पर उसे
था, अति गुमान
उसके पास था
डिग्रियों का भंडार
सपनों में बँधकर
लगा वह उड़ने
पर भटकते-भटकते
लगे अंग उसके छिलने
लहुलूहान मन देख
लगी शिक्षा रोने
किताब-कापी का ढ़ेर
बनी रद्दी की टोकरी
उपलब्धियाँ भी
लगी चिड़चिड़ाने
मिला नहीं जब
कोई रोजगार
नाकामियों पर
लगे आँसू बहने
क्या मुँह दिखलाये 
माँ-बाप को अपने
कुर्बानियों पर जिनके
पाले थे बडे सपनें
सारी मनोकामनाएं
बेआबरु हो बदली
लेके निकम्मेपन व
बेरोजगारी का तमगा
किससे कहे
किसको समझायें
मुँह छुपाकर बैठे है
अपने ही घोसलें में
निराशा के बादल को 
अपनी कब्रगाह मानकर।।।
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हौसले की उड़ान (कविता)
कोरोना महामारी 
के माहौल में
क्या हुआ आज, जो
हो गये बेरोजगार
ठिठक गये कदम         
रुक गये सब काम       
तब बैठकर एकदिन      
सोचने लगे कई बार    
यूं निठल्ला बैठने से                            
नहीं चलेगा काम
उम्मीद जगाने के बाद
तलाशना है कोई काम
तभी नजर आया
एक नन्हां परिंदा 
उड़ने की चाहत में
पंख फड़फड़ाता है 
बार-बार गिरता है,
फिर भी सम्भलता है
मानता नहीं हार
अपने उम्मीदों के लिए
करता है बड़ी कोशिशें
होता है बुलंद 
उसका जब हौसला
नाकामियाँ भी तब
हो जाती है पस्त
उड़ने लगा परिंदां
दे गया, कई नसीहतें
ऐसी ही मेहनतों की
उसे भी है दरकार
उठना उसे भी है
बुलंद हौसले के साथ
क्योंकि आगे अभी भी 
हैं, रास्ते नये हजार
आगे कदम बढ़ायेंगे
तो मिलेंगी नई मंजिलें
जैसे मिली थी 
कई कोशिशों के बाद
नन्हें परिंदा को
सफलता का उपहार
खुशियों से भरा 
अद्भुत नया संसार।।।
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1 टिप्पणी:

Shauryashil Verma ने कहा…

Bahut sunder kavita hai.