एहसास की सुखद अनुभूति (लघुकथा)

एहसास की सुखद अनुभूति (लघुकथा)

गणतंत्र दिवस पर दिल्ली के राजपथ से निकलने वाली झांकी को करीब से देखती हुई शामली उत्तेजित थी। इस परेड मे शामिल उसकी इकलौती बेटी अदिति का जोश व जज्बा देखने योग्य थी। देश के प्रति जीवन कुर्बान करने वाले पति और पुत्र को मन ही मन में श्रद्धांजलि अर्पित करने वाली शामली आज बड़ी प्रसन्न थी। 
एक समय था जब अदिति ने माँ से पूछा था," माँ, पापा और भैया अचानक सीमा पर लड़ते हुए शहीद हो गये। उनके शहीद हो जाने के बाद आपको उनके फौज में जाने का कभी मलाल तो नहीं होता है?" 
माँ चौंककर अदिति को देखी, फिर गर्व से बोली थी,"मलाल कैसा, बेटी? मलाल तो कभी नहीं हुआ। हाँ, आज दुख इस बात का होता है कि यदि मेरे और बेटे होते, तो मैं उन्हें भी फौज में भर्ती करा कर अपने परिवार की परम्परा और गौरव को बढ़ाती और गर्व महसूस करती।"  माँ के चेहरे की चमकती आभा को देखकर अदिति माँ को चूमती हुई बिना कुछ बोले वहां से उठ गई। 
मन की दृढ़ता के लिए एक क्षण ही काफी होता है। माँ के चेहरे के नूर से अदिति के मन में एक दृढ़ता बस गई। उसी दृढ़ता के बलबूते अदिति आज  अपने परिवार की परम्परा को कायम रखते हुए एनडीए की परीक्षा उत्तीर्ण करके फौज में दाखिल थी।
गणतंत्र दिवस की झांकी को पास से देखने के लिए अदिति ने विशेष तौर पर अपनी मां को अगली पंक्ति में बिठा दिया था।
 परेड के बाद जब अदिति अपनी माँ से मिली तो माँ के गले में अपने बाहों का हार पहनाते हुए बोली," माँ, अब तो आपको अपने और बेटा न होने का दुख तो नहीं है।"
"अरे नहीं बेटी, तू मेरे परिवार की परम्परा को कायम रखने वाली वीर योद्धा मेरी शान, मेरा अभिमान और मेरी बेटी हो। मुझे तम्हारे बेटी होने पर भी वही गर्व है, जो गर्व मैं तुम्हारे पापा और भैया पर करती थी।" 
आलिंगनबद्ध माँ-बेटी की आँखों से निकलने वाले खुशी के आँसूं बेटा-बेटी के भेद को समाप्त कर एक में विलीन हो गये।
26.01.2022.

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