बेबाकी (लघुकथा)

"साहब बीस रुपये में ले लीजिए। बड़ी कृपा होगी।" शीशे के सामने दस साल का लड़का हाथ में प्लास्टिक का गुलदस्ता लेकर रिरियाते हुए बोला।
कार में बैठे साहब को गुस्सा आ गया। वे मुहँ को फेर करके दूसरी तरफ देखने लगे। उनकी इस बेरुखी पर भी वह आगे नहीं बढ़ा, तब साहब पलटे, फिर गुस्से से बड़बड़ाते हुए बोले," क्यों दस रुपये की चीज को बीस की बताकर लूटने चले हो? भागो यहाँ से, नहीं तो अभी पुलिस को बुलाता हूँ।"
"क्यों साहब, लेना हो तो लो, वरना गाड़ी आगे बढ़ाओ। पुलिस का नाम लेकर हमें डराते हो। अरे हमारे ही बीस-पच्चीस से उनकी शाम रंगीन होती है। वह हमें क्यों भगायेगा?" 
शान से बुदबुदाते और सच का आईना दिखाता हुआ वह लड़का गुलदस्ता लेकर आगे बढ़ कर दूसरे कार के शीशे के सामने खड़ा हो गया। गाड़ी में बैठे साहब उसकी बेबाकी पर हैरान होते हुए उसके मुंह को निहारने लगे।

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