खजुराहो की घुमक्कड़ी (यायावरी)

खजुराहो की घुमक्कड़ी (यायावरी)

----------------------- (बादलों के झुरमुट आँखमिचौलियों के बीच बसे पहाड़ों की अट्टालिकाओं और समुंद्र की उछाल मारती लहरों वाली प्राकृतिक संपदाओं से दूर अचानक कलाकृतियों से युक्त मंदिरों के विशाल समूह में जब घुमने, विचरने का अवसर मिला, तब कोरोनाकाल की दुश्वारियों के बावजूद भी मन आंनद की उपलब्धि लेने से स्वयं को मुक्त नहीं कर पाया।)


कोरोनाकाल के लॉकडाउन समय में मन भयभीत था और सुरक्षा के आवरणों से जकड़े हुए हम घर में कैद थे। काफी समय एक ही नीरस व भयावह वातावरण में रहते हुए मन बेचैन हो गया। अचानक सतर्कता के साथ जब अनलॉक का समय आया, तब हम लोग इस मकड़जाल से बाहर निकलने को आतुर दिखे। अतः जब अवसर मिला  तब हम घर से निकलकर एक खुले स्वच्छंद वातावरण में सांस लेने के लिए खजुराहो घुमने के लिए नोवा गाड़ी से निकल पड़े। घुमने से मनोस्थिति में जो बहुत बड़ा परिवर्तन आया, वह हमें जीवंतता के बहुत करीब लाकर खड़ा कर दिया।  

मंदिरों का सबसे बड़ा समूह----

खजुराहो के मंदिरों की खोज ब्रिटिश इंजीनियर टी एस बर्ट ने की थी। इस स्थान की भव्यता, सुंदरता और प्राचीनता को देखते हुए युनेस्को ने इसे 1986 में विश्व विरासत की सूची में शामिल किया है।

भारत के मध्यप्रदेश प्रांत के छतरपुर जिला में स्थित खजुराहो एक ऐसा छोटा सा स्वच्छ शहर है, जो प्राचीन एवं मध्यकालीन चंदेल वंश के राजाओं द्वारा निर्मित कलात्मक हिन्दू और जैन मंदिर के भंडार के कारण विश्वविख्यात है। खजुराहो को प्राचीन काल में 'खजूरपुरा' और 'खजूर वाहिका' के नाम से भी जाना जाता था। यहाँ खजूर के पेड़ों का विशाल बगिचा था, इसलिए इसका नाम खजुराहो पड़ा। इन मंदिरों का निर्माण 950 ईसवीं से 1050 ईसवीं के बीच हुई थी। मंदिरों को बनाने में करीब 100 साल लगे। पहले मंदिरों की संख्या 85 थी, जो अब घटकर 22 ही रह गई है। मंदिर परिसर को तीन भागों में विभाजित किया गया है पश्चिमी,पूर्वी और दक्षिणी। पश्चिमी में अधिकांश मंदिरों का समूह है,पूर्वी में नक्काशीदार जैन मंदिर है, जबकि दक्षिणी समूह  में कुछ ही मंदिर है। हमने खुदाई में मिले एक अधुरे मंदिर के खंडहर को भी देखा। खुदाई में मिले पत्थरों को संरक्षित करने और मिलाने का काम अद्भुत था, पर लॉकडाउन के कारण यह काम अधुरा ही पड़ा था। 

खजुराहो लखनऊ से करीब 300 किमी की दूरी पर स्थिति है।

 वहाँ अधिकांश समय हम गाइड के साथ मंदिरों के दर्शन करते और एक एक कलाकृतियों की सुंदरता को बारीकी से निहारने और आनंदित होने में व्यस्त रहे। इन मंदिरों में भव्यता,जीवन्तता और कलात्मकता का जो संगम समाहित है, वह कला प्रेमियों के लिए एक अनूठा उपहार ही लगा। 

पत्थरों के चट्टानों पर बने सुंदर कलाकृतियाँ दाँतों तले अंगुली दबाने को मजबूर कर रही थी। मंदिर की बाहरी दिवारों पर असंख्य सुंदर कलाकृतियाँ है..जिनकी बनावट, साज-सज्जा अपने अप्रतिम गुणवत्ता के कारण पर्यटकों का ध्यान आकर्षित करती है। 

प्रत्येक मंदिर अपने शिल्प, सौंदर्य तथा शैलीगत विशेषताओं के लिए प्रसिद्ध है। एक-एक मूर्ति की कला देखने में समय व्यतीत होने की कोई सीमा ही पता नहीं चल रहा था। हम घंटों मंत्रमुग्ध हो एक ही कला को अपलक निहारने में लगे रहते थे, जब तक कि हमें कोई टोककर आगे नहीं बढ़ाता था।

मंदिर की बाहरी दिवाल कई पट्टियों पर अंकित है।  यहाँ हाथी, घोड़े , योद्धा और सामान्य जीवन के अनेकानेक दृश्य है। अप्सराओं को इस तरह व्यवस्थित किया गया है कि वे स्वतंत्र, स्वच्छंद एवं निर्बाध जीवन का प्रतीक मालूम पड़ती है। कामकला के आसनों में दर्शाए गये स्त्री-पुरुषों के चेहरे पर एक अलौकिक और दैवी आनंद कीछटा झलकती है। प्रेमी के पत्र को पढ़ने के बाद  उसकी यादों में खोई मनन करती प्रतिमा के हावभाव दिल को छू गए। 

  सबसे प्रसिद्ध था लक्ष्मण मंदिर जो विष्णुजी को समर्पित था।

कंदरिया महादेव मंदिर, लक्ष्मण मंदिर, चतुर्भुज मंदिर, लक्ष्मी मंदिर, वराह मंदिर, देवी जगदम्बा मंदिर, सिंह मंदिर, सूर्य(चित्रगुप्त) मंदिर, विश्वनाथ मंदिर, वामन मंदिर, नन्दी मंदिर , पार्वती मंदिर आदि यहाँ की प्रसिद्ध मंदिरें है। जैन मंदिर पुराने हिंदू मंदिरों के अवशेष पर ही बना है। ये मंदिर और इनका मूर्तिशिल्प भारतीय स्थापत्य और कला की अमूल्य धरोहर है।

कंदारिया महादेव का मंदिर---यह खजुराहो का सबसे विशाल तथा विकसित शैली का मंदिर है। यह मंदिर सप्तरथ शैली में बना है, जिसकी उंचाई और लम्बाई लगभग 117 फुट और चौड़ाई लगभग 66 फुट है। इसके बाहरी दीवारों पर कुल 646 मूर्तियां है तो अंदर भी 226 मूर्तियां स्थित है। इतनी मूर्तियां अन्य किसी मंदिर में नहीं मिलेगी। यह मंदिर भगवान शिव को समर्पित है।

मतंगेश्वर--- मतंगेश्वर खजुराहो का सबसे प्राचीन मंदिर है, जिसे राजा हर्षवर्धन ने 920 ई. में बनवाया था। 

मंदिरों में  मूर्तियों की सुंदरता, उनकी भाव-भंगिमा को देखना बहुत अद्भुत है, जिसे लेखनी में समेटना बहुत कठिन है, पर एक बार खजुराहो जाने के बाद बार-बार जाने का मन करेगा।

निकटवर्ती दर्शनीय स्थल

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कालिंजर और अजयगढ़ का दुर्ग -----

खजुराहो से 105 किमी दूर कालिंजर का किला है। यह प्राचीन किला है, जिसका संबंध चंदेल वंश के उत्थान-पतन से है। प्राचीनकाल में यह शिव भक्तों की कुटी थी। 108 फुट उँचे इस किले में प्रवेश के लिए अलग-अलग शैलियों के सात दरवाजों को पार करना पड़ता है। इसके अंदर आश्चर्यचकित करने वाली पत्थर की गुफाएं है। यहाँ बहुत से बेसकीमती पत्थर पड़े हुए है। इसके भूमि तल से पातालगंगा नामक नदी बहती है जो इसकी गुफाओं को जीवंत करती है।

खजुराहो से 80किमी दूर अजयगढ़ का दुर्ग है। विंध्य की पहाड़ियों की चोटी पर यह किला है किला में दो प्रवेशद्वार है। किले के बीचोबीच अजय पलका तालाब नामक  झील है। झील के किनारे बहुत से प्राचीन मंदिर है। 

लॉकडाउन के बाद के पहले पर्यटक----

पहला शब्द सुनने में बहुत अच्छा और आकर्षक लगता है। पर्यटकों से सदैव भरा रहने वाला माहौल आज खामोश था। होटल में हम लॉकडाउन के बाद के पहले मुसाफिर थे। 

गाइड अनुराग को लॉकडाउन के बाद का पहला काम था।

और तो और जब मंदिर के बाहर किताब बेचने वाले से मैंने बात की तो वह बहुत खुश हुआ, बोला," आप तो किताब लेकर बात भी कर रही है, वरना कोई बात करने को तैयार नहीं होता था। रोज चार-पाँच सौ की किताब बेचने वाला घर में कैद हो गया। आज नवरात्र व शनिवार होने की वजह से आ गया, वरना आता ही नहीं था।"

लाइट एण्ड साउंड प्रोग्राम----

खुला मैदान, हल्की सिरहन के बीच जिज्ञासु मन लाइट एण्ड साउंड शो का लुफ्त उठाने में पूरी तल्लीनता से ड़ूबा हमारा परिवार पर्यटकों के अभाव में वहाँ अकेला ही था। यद्यपि वहाँ का इतिहास की जानकारी होने पर मजा बहुत आया, पर भीड़ भरे वातावरण की कमी खटक रही थी। यह कार्यक्रम खजुराहो के इतिहास को जीवंत कर देता है।

पन्ना राष्ट्रीय उद्यान----

खजुराहो से 57किमी दूर स्थित है।यहाँ की सफारी  यात्रा हमने की। वनविहार के अंदर जाते ही हमें बाघ दिख गया।  सागौन के वृक्षों से सजे वन मे बेजोड़ सुंदर केन नदी बहती है। हिरण, मोर के अतिरिक्त और भी जानवर दिखे, जिनका हमने भरपूर आनंद लिया।

पाण्डव केव----

खजुराहो के पास ही पाण्डव केव घुमने की जगह है। झरनों के मध्य पाण्डवों की गुफा देखने में मजा आया।

जाने का मार्ग----

लखनऊ से खजुराहो का सीधे हवाई मार्ग है। कानपुर से खजुराहो का रेल मार्ग है पर लखनऊ से सीधा कोई ट्रेन मार्ग नहीं है। सड़क के द्वारा कानपुर से महोबा होते हुए छतरपुर खजुराहो पँहुचा जा सकता है।


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