जागृति अभिलाषा (कविता)

जागृति मन की अभिलाषा लिए,
मैं आगे बढ़ती जाती हूँ।
धूलधूसरित न हो जाए ख्वाब,
अतः सपनों में पंख लगाती हूँ।

बहुत कठिन है सार्थक करना, सपनों को,
पर हाथ पर हाथ रखकर बैठूं, क्यों?
कुछ करने को सोंचू, कुछ में रम जाऊं,
नये कलेवर में बह सपनों को सजग बनाऊं,मैं।

मासूमों की किलकारियाँ सुनूं,
बच्चों संग छुकछुक ट्रेन चलाऊं।
पोते-नातियों संग आर्ट बना,
बुढ़ों का सम्बल बन जाऊं।

चिड़ियों की चहचहाहट सुनती,
कोयल की कूं कूं आवाज निकालूं।
बकरी-गाय को रोटी खिलाती,
मेमना-बछड़े को पुचकारती रहूँ मैं।

पेड़ पौधौ से नाता जोड़ूं,
रोज मिट्टी में लोटरियाँ मारुं।
रेत छानकर महल बनाऊं,
फिर सागर में बह जाने दूं।

मंजिल कभी मिले या न मिले,
रुकना अब अपने वश में नहीं।
जिसके भी काम आ सकूं कभी,
उसके सपनों का संबल बन जाऊं।

जीवन को बेहतर बनाने के लिए,
जीने की कला समझना होगा।
नहीं बैठना नीरस बनकर,
आगे कदम है, बढ़ाते रहना।
08.05.21.

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