बिवाईयों वाला पैर (कविता)

आखिर ये पैर है किसके???
ये प्रश्न हर पल उठता है, मेरे मन में
कटे-फटे, मटमैले बिवाईयों से पूर्ण
थके-हारे, बोझिल गंदे पैर को देख
मन विह्वल हो फिर पूछता है...
आखिर ये पैर है किस-किस के???

क्या ये है यह, उस किसान का, 
जो जी-तोड़ मेहनत करता है खेतों में
खून-पसीना बहाकर लहराता पेड़ उगाता है  
पर प्रकृति के क्रूर हाथों 
फसल की बर्बादी को देखकर 
अरमानों के टूटने पर, घायल मन को
सुदृढ़ नहीं रख पाता है सम्भाल कर
तब बेबस व विकल होकर मौत को गले लगाता है।

या है, यह उस नौजवान मजदूरों की टोली का 
जो कर्मठ होते हुए भी, काम की तलाश में
दर-दर भटकता और तड़पता है
और काम का जुगाड़ न कर पाने पर 
खाली हाथ विकल हो लौटता है, घर को
फिर सामने पा अपने भूखे बच्चों को 
मुँह चुराये फिरता और कलपता है
अगले दिन काम की तलाश में फिर निकलने को सोचता है।

या है, यह उस बेबस बेरोजगार युवा का
जो निकलता तो है, रोजी-रोटी की तलाश में
पर काम न मिलने पर
नाकामी का ठप्पा लगाकर 
नाकारा कहलाता घर लौटता है।
जो बाप के बुढ़ापे की लाठी
बनने में स्वयं को असमर्थ पाता है
छलनी होते युवा मन के आक्रोशों को 
मुट्ठी बंदकर मींचता और खिसियाता है।

या है यह उस बेबस-असहाय पिता का 
जो कुवांरी बेटी के सुयोग्य वर की तलाश में 
खटखटाता है कुंडी लड़के के घर वालों का
पर अभाव में मोटी गठरी दहेज के   
अपने को निर्बल व असमर्थ पाता है
बेटी की डिग्री व गुणों को दिखलाकर
फैलाता है झोली वर पक्ष के सामने 
पर  पाकर क्रुरता, लड़के के माँ-बाप की 
वह निर्बल बन मुँह लटकाये लौटता है।

या है यह, उस नारी मन के विवशता की
जो जुझती है,दिनरात गृहस्थी के जालों में
लगाती है चक्कर सबके चारों ओर 
रिश्ते बनाती, सँवारती और सहेजती है,
सबको खुश करने की अभिलाषा में
आहुति  देकर अपनी खुशियों की 
तिल-तिल जलाती है, स्वयं के इच्छाओं की
पर होती है आहत, तानों व उलाहनों की बरसातों से 
तब भी खरी नहीं उतरती है, घुट-घुटकर जीती है
तिलांजलि देकर अपने अभिलाषाओं की।

किसने-किसने देखा है, इन पैरों को?
किसने महसूस किया, उनके दर्द को?
किसके मन में कौंधता है, मेरी तरह,
आखिर ये पैर है किस-किस के???
आखिर ये है... किस-किस के पैरों के???

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