सकारात्मकता का खेल (लेख)

मैं सकारात्मकता( पॉजिटिव) से पूर्ण यानि जीवंत थी। इसलिए जीने की कला से परिपूर्ण थी..अपने दैनिक क्रिया-कलापों में व्यस्त थी। इसलिए उम्र का कोई पादान मेरे राह का रोड़ा नहीं था। मैं, बूढ़ों में बूढ़ी थी, जवानों में जवान थी, किशोरों में किशोर थी, तो बच्चों में नन्हीं बच्ची बन जाती थी। सकारात्मक सोच, उर्जा और कामों में मन लगाती थी, इसीलिए हँसती थी, लोगों को हँसाती थी, चुहुलबाजियाँ करती थी, बच्चों के साथ पार्क में खेलती थी, मचलती थी, दौड़ती थी और उन्हें दौड़ाती भी थी। कहने का तात्पर्य यह था कि दुखों के पहाड़ को भी सहनशीलता से झेल जाना मेरी गुणवत्ता थी, इसलिए जो निगेटिव व्यवहार करता उससे दूर भागती थी। कसमसाती थी..लगता था ये जीवन को पीछे खींच रहा है। इसलिए सतर्क हो जाती थी। फिर धीरे-धीरे अपने विचार को बदलती और उसके संपर्क में आने की कोशिश करके उसे सकारात्मकता का पाठ पढ़ाने में जी जान से जुट जाती थी। यही मेरे जीवन का उद्देश्य था।
लेकिन पिछले साल से जब इस कोरोना ने देश-दुनिया में अपना कहर बरसाना शुरू किया। तो लोग त्राहि-त्राहि करने लगे। स्कूल-कालेज बंद हो गये। परीक्षाएं स्थगित होने लगी। ऑफिस-बाजार, मॉल, सिनेमाघर सब बंद करके लॉकडाउन लगाना पड़ा, तब जिंदगी एक बार थम सी गई। डराती, झेलाती और अपने चपेट में लोगों को लीलती जब कोरोना एक बार अपना कहर बरपाने के बाद थम सी गई, तब लोगों ने कुछ दिन चैन की सांस के साथ जीवन जिया। हम इसके भूलावे को भूलने और बिसराने लगे और आगे के लिए सतर्क होने की तत्परता और जागरूकता को भूला बैठे। अपने मौज-मस्ती और महत्वाकांक्षाओं की आड़ में हम यथार्थ के इस कहर को भूल गये और सीख ग्रहण किए नहीं और सामान्य हो गये। हमारे इसी भूल का फायदा उठाकर एक बार कोरोना पुनःपैर पसार कर तीव्र व उग्र रूप धारण करके पलटकर फिर हमारे बीच आकर हमें तबाह करने लगा। पछतावा हमारे रग-रग में बसा है...हम पछताते रहे, पर सतर्कता का पाठ पढ़ नहीं पाये।
  तभी तो कोरोना महामारी ने सकारात्मकता के छलावे वाले चोला को धारण करके हमें भरमाना शुरू कर दिया है। जब से उसने पॉजिटिव-निगेटिव का अपना उल्टा खेल फिर से खेलना प्रारम्भ कर दिया है, तब से हमारे जीवन का मकसद भी सकारात्मकता और नकारात्मकता के विचित्र उलझन में डूब गया है।
सकारात्मकता की सोच में जीने वाले हम कोरोना के पॉजिटिव होने से घबड़ाने लगे है। पॉजिटिव सोच में जीने वाले हम कोरोना से निगेटिव होने की दौड़ में जुट गए है। नकारात्मकता से दूर भागने वाले हम अब त्राहि माम की पुकार लगाकर कोरोना निगेटिव होना चाहते है, ताकि जीवन के बेहतर समय को हम सुगमतापूर्वक जी सकें।
लेकिन इस कोरोना महामारी की छलावे वाली कोरोना पॉजिटिव पर यदि हमें विजय भी प्राप्त करना है तो भी हमें जीवन के सकारात्मक रुख को ही अपनाना पड़ेगा। हम सकारात्मक सोच,उर्जा, प्रभाव और परिणाम से भरे रहेंगे तो कोरोना पॉजिटिव होते हुए भी हमारा कुछ बिगाड़ नहीं पायेगा। बस हमें हिम्मत की जरूरत है। घबड़ाना नहीं है। सोच को सकारात्मक करते हुए इससे बचाव के सभी सार्थक उपाय का क्रियान्वयन करना पड़ेगा। मुँख पर मास्क, सोशल डिस्टेंडिंग, हाथ को बार-बार धुलना, लॉकडाउन का पालन करते हुए घर में सुरक्षित रहे, तो हम कोरोना पर विजय प्राप्त कर लेंगे।

लेकिन अभी हम अपने सोच को अमली जामा पहना भी नहीं पाये और हम चैन की बंसी ठीक से बजा भी नहीं पाये कि चारों तरफ एक बार फिर अफरा तफरी का माहौल व्याप्त हो गया। कोरोना के कहर की सुमानी देश में चारों तरफ फैलने लगी। इस बार यह इतनी विकट थी कि जो सुचनायें हम टीवी और अखबार में देखते और पढ़ते आ रहे थे, वह घर के आसपास, पड़ोस और रिश्तेदारी में भी दिखने लगा। हम डरने लगे, सतर्क होने लगे, सम्भलने लगे।
 पर अभी हम इसके विभिषिका की गम्भीरता के तह में जाते, तब तक यह हमें भी अपने आग में लपेट लिया। इसने हमारे दो दिल अजीज लोगों को हमसे बिछुड़ा दिया। इस पर भी इसका मन नहीं भरा तो इसने दो लोगों के साथ हमें भी और हमारे बहुत से करीबी लोगों को पॉजिटिव कर दिया। 
हमारे परिवार में हम तीन लोग कोरोना पॉजिटिव हो गये। एक साथ तीन लोगों का पॉजिटिव होना मायने रखता है। हम तीनों लोग एक दूसरे के संबल और सहारा बने एक दूसरे को देखते हुए जीने की कोशिश में लगे रहे। तीन कमरे में तीनों लोग अर्ध मूर्छित अवस्था में पड़े रहते। दूर से हालचाल ले लेते, पर एक दूसरे के समीप घड़ी दो घड़ी बैठने की हिम्मत ही किसी के पास नहीं थी, जो एक दूसरे की थोड़ी भी सेवा कर पाते। नीरीह व बेबस आँखों में बहुत बड़ी विवशता थी। टुकुर-टुकुर एक दूसरे देखते, पर स्पर्श से दूर रहते थे। वैसे हम नाश्ते, खाने और थोड़ी देर टीवी देखने के लिए एक ही कमरें में होते थे। बातचीत बहुत कम होती थी।
तब से मन निगेटिविटी को पाने के लिए कुलबुला रहा था। निगेटिविटी की उम्मीद इस कदर मन में ऑफत मचाएगी..यह कभी सपनें में भी नहीं सोचा था।
पर निगेटिविटी पाने की उम्मीद में भी हमें पॉजिटिविटी का दामन नहीं छोड़ना था। यह हमने दृढ़ निश्चय कर लिया था। हमें अपने को जीवंत रखने के लिए पॉजिटिव एनर्जी, पॉजिटिव सोच, पॉजिटिव क्रियाकलापों को ही अपनाना था। इसलिए हमनें हिम्मत को हारने नहीं दिया और संयम का दामन थामें हुए दिन बीताने लगे। ऐसे समय में बच्चे देवदूत बन गये थे। शालू-बाबू-मंटू के लगन, क्रियाकलापों और स्फूर्ति से लिया गया निर्णय बहुत कारगर और जीवंत करने वाला था। मंटू तो स्वयं बीमार होते हुए भी हमारे लिए संजीवनी बना हुआ था। दो कौर भोजन और पानी जो मुँह में पड़ता था, वह शालू-मंटू की बदौलत ही पड़ता था। मंटू अपना घर छोड़कर यहाँ पड़े हुए माँ-बाप की सेवा में जुटे और उन्हें सम्भाले हुए थे। यह उसकी बहुत बड़ी विशेषता थी। शालू अपने ड्राइवर उमेश के साथ तीन घरों की व्यवस्था सम्भालने में लगी थी। संजीवनी मतलब पुनः जीवन...हमें यह संजीवनी मिली अपने बच्चों से ही...जिनका शुक्रिया अदा करना मेरा भी काम है।
कहने का तात्पर्य यह है कि कोरोना अपने पॉजिटिव खेल में लगी हुई थी। लेकिन हमें भी इसके जोड़ को तोड़ने के लिए भी पॉजिटिव का ही खेल खेलना पड़ेगा। यदि हम मन से, सोच से, उर्जा से, अपने क्रियाकलापों से पॉजिटिव नहीं रहेंगें, तब हम कोरोना के पॉजिटिव खेल को बिगाड़ नहीं पायेंगे। 
निष्कर्ष यही है कि कोरोना पॉजिटिव को हराने के लिए हमारी सोच, विचार, क्रियान्वयन पॉजिटिव हो, हम मास्क लगाकर रहें, सोसल डिस्टेंडिंग का पालन करें, बार-बार हाथ धुलें, घर को सेनेटाइज करें...तभी हम कोरोना के पॉजिटिव असर को हराकर निगेटिव कर पायेंगे।
 इसलिए एकबार हम फिर दृढ़ होकर जागरूक हो जाएं, ताकि असमय आये इस विपदा से छुटकारा पा लें।

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