दीप प्रज्वलित करो मन का... (कविता)

मन के विश्वास
की ज्योति जलाकर,
अगर हम जीवनपथ
पर बढ़ते जायेंगे।

तब गम का अंधेरा
छिप जायेगा,
सूरज की अरुणिमा
नभ पर निखरेगी।

दिन उज्जवल
हो चमकेगा,
कोई मुँह
नहीं छुपायेगा।

घुलमिलकर सब
मिलेंगें-जुलेंगे,
खुशी भी हँसी बनकर
खिलखिलायेगा।

नाते-रिश्ते सब
एक होंगें,
जब प्रेमभावना
जागृति हो जायेंगा।

इस नफरत 
भरे माहौल को,
हम दोस्ती में
बदलकर दिखलायेंगे।

दीप प्रज्वलित करके मन का
हम आगे बढ़ते जायेंगे,
मन में मिले प्रकाश को
हम आगे तक फैलायेंगे।

यहीं होगा जीवन का उद्देश्य
सब फूल सरीखे खिल जायेंगे,
तब जीवन सरल हो जायेगा
मुखरित हो सब मुस्कुरायेंगे।


03.05.21.

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