आखिर अक्ल आ गई (लघुकथा)

आइसोलेशन के 14 दिन अस्पताल में बिताने के बाद मनोज का रिपोर्ट जब निगेटिव आया, तब उसे अस्पताल से छुट्टी मिली। घर लौटते समय मनोज खुश होने की अपेक्षा ग्लानि से भरा हुआ था। कोरोनाकाल में मिले भयंकर असहनीय एकांतवास के पल में वह विक्षोभ-विषाद से विचलित था। उसे पापा के मौत के बाद के माँ के चार साल के आइसोलेशन पीरियड की पीड़ा आइना दिखा रही थी। सबके होने के बावजूद माँ के अकेलेपन के दुखदायी दर्द को झेलाने में उसका भी बड़ा हाथ था। 

घर पँहुचकर मनोज स्वागत में पलकें बिछाये उल्लसित खड़े पत्नी-बच्चों और पड़ोसियों को छोड़ता हुआ जब वह उपेक्षित पड़ी खामोश माँ के कमरे में गया तो सभी आवाक हो गये। मनोज माँ को पकड़कर फूट-फूटकर रोने लगा। माँ-बेटा का यह मिलन पत्नी और बच्चों को भी विचलित कर दिया। कुछ न समझ पाने की स्थिति में वे मूकदर्शक बने एकतरफ खड़े थे।

माँ रजनी भी बेटा के सिर को सहलाते हुए खुशी के आँसू रो रही थी। जिस पल को तरसती उसकी आँखें अब तक निश्तेज हो गई थी..वह खुशी के पल उसे अचानक कैसे नसीब हो गया? वह बेटा के मुँख को चुमती हुई उसके मुँखड़े को हथेलियों में भरकर मूक नजरों से निहारने लगी तो मनोज जोर से सिसकता हुआ माँ के आँचल में मुँह छुपाकर और जोर से रो पड़ा। उसके बोल फूट नहीं रहे थे।

जी भरके रो लेने के बाद मनोज उठे और माँ को सहारे से उठाते हुए बोले," माँ, अब तुम यहाँ नहीं, बल्कि हम लोगों के साथ आगे रहोगी, जहाँ हम सब एकसाथ रहते है।"

"बेटा, ये तुम्हारे बोल है, वो भी अपनी पत्नी के सामने?" माँ रजनी आश्चर्य से बोली।

"हाँ माँ, कोरेंनटाइन के कठिन एकांतवास पल ने एकांतवास की दुश्वारियों और उपेक्षित जीवनशैली की कटुता से जब मेरा परिचय कराया तब मुझे अपनी गलतियों का आभास हुआ। माँ इस सीख ने मेरी आँखे खोल दी है। अब ऐसी गलती दुबारा नहीं होगी। अब हम सब एक साथ मिलजुल कर रहेंगे।"

देर से ही सही, पर दुरुस्त हुए बेटा को एक बार फिर गले लगाकर माँ फफक पड़ी। इसी बीच बहू और पोता भी पास आकर उनके गले लग कर रोने लगे । थोड़ी देर में खुशियों का माहौल छा गया।

 कोरोना एक बार एक परिवार में पॉजिटिव क्या हुआ...निगेटिव हुए उनके संबंधों की डोर को भी पॉजिटिव कर दिया।



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