डरने से अच्छा है जीना (लेख)

थक गया हूँ, बुझ गया हूँ, 
मन में दहशत फैल गई है, 
लॉकडाउन में अकेला दिल कमजोर होने लगा है, 
यदि मन-मस्तिष्क की सारी किवाड़ें कोरोनाकाल में बंद कर ली हैं, 
तो मायूस होकर यू हीं पड़े रहकर अपने दिल-दिमाग को और कुंद मत करो। 
बुझो नहीं, रुको नहीं, ठहरों नही, 
उठो, 
बंद होते दरवाजे को खोलो...
अपने मेहनत और मशक्कत से। 
फिर खिलते फूल-पत्तियों और पेड़ो को निहारों। 
सूर्य-चाँद-सितारों की कर्तव्यपरायणता को सराहों, उनकी खुशियों में खुशियाँ ढ़ूढ़ों। 
फिर फूल खिलाओं, तुलसी रोपों, पेड़ लगाओ, मिट्टी खोदो, गमले सजाओ, गमले रंगों। 
अपने मन-पसंद क्रियात्मक कार्यों को करके मन लगाओ, मन बहलाओ। 
ऐसा करके उत्तम पलों को जी कर आनंदित हो। ये सब जाने कितने काम व उत्तरदायित्व है तुम्हारे पास… जो तुम लॉकडाउन व विषम परिस्थितियों में अकेले रहकर भी करके स्वयं को उर्जावान बनाकर जीवंत कर सकते हो।
फिर तुम्हें किसी चीज से डरना क्या? डरोगे तो जीते जी मर जाओगे… मर जाओगे तो तुम्हारे सहारे जो है, उन्हें बहलायेगा और सम्भालेगा कौन? 
इसलिए स्वयं उर्जावान बनों, स्फूर्ति लाओ, दूसरो के जीवन को जीवन प्रदान करने के लिए जीवंत बनों और उस काम में जुट जाओ, जिन्हें करके तुम स्वयं को उत्सुक कर सकते हो और लोगों को उत्साहित करके जीवन के प्रति सकारात्मक सोच को प्रेरित करके, उन्हें जीवंत कर सकते हो…...। 
जीवन जीने का नाम है...।

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