अपने पांव में कुल्हाड़ी मारना (बाल कहानी)

जगौरी गाँव का रामधीन मेहनत-मजदूरी करके अपने परिवार का भरण-पोषण करता। मिट्टी से बना छोटा सा खपरैलों वाला मकान उनके परिवार का बसेरा था। घर के सामने एक बड़ा सा पुराना बाप-दादा का लगाया हुआ पुश्तैनी पेड़ था। यह पेड़ उसके घर की शोभा और निशानी थी। रामधीन के दो बेटे थे, सरजू और कलगू। 

बड़े होने पर दोनों की शादी हो गई। पूरा परिवार अब भी उसी मकान में मिलकर रहता था। धीरे धीरे सरजू के लिए मकान छोटा और मुसीबत लगने लगा, तब वह अपने पिता रामधीन से अनुरोध किया," बापू, बाहर वाले पेड़ को काट दिया जाए, ताकि घर को पेड़ की जमीन पर बढ़ाकर और बड़ा किया जा सकें।"

रामधीन ने कहा," यह पेड़ हमारे पूर्वजों की निशानी है। मैं इसे कटवा नहीं सकता। इसलिए जैसे रहते हो, वैसे ही रहो। वरना अपना अलग व्यवस्था कर लो।"

सरजू रामधीन के दलील के सामने कुछ बोल नहीं पाया, पर वह अपने परिवार के साथ स्वतंत्र रहने का इच्छुक था। उसे संयुक्त परिवार में रहना बंदिशों में रहने जैसा लगता था। पिता के द्वारा पेड़ काटने की अनुमति न मिलने के बाद वह अपना घर अलग दूसरी जगह बनाकर परिवार सहित रहने और मजदूरी करके अपने परिवार का पालन-पोषण करने लगा।

 रामधीन के मृत्यु के बाद भी कलगू अपने पुस्तैनी मकान में ही रहता और प्रधान के खेतों में काम करके अपना परिवार पालता था। मकान के सामने के पेड़ की वह बहुत इज्जत करता था। हरे-भरे फूल-पत्तियों से लदे पेड़ पर बहुत से पक्षियों का बसेरा था, जिसे देखकर गरीब कलगू के आँखों में चमक आ जाती थी। बुजुर्गों द्वारा लगाये पेड़ को सुरक्षित बचाना कलगू अपना कर्तव्य समझता था। इसलिए नियत समय पर पेड़ की सिंचाई-गुड़ाई करना वह अपना कर्तव्य समझता था। पेड़ की छाँव में कलगू का परिवार सदैव हँसता-खिलखिलाता ही रहता था, क्योंकि गरीबी के बावजूद उनके परिवार में एकता और सामंजस्य था। पेड़ पर चहकने वाले पक्षियों के कलवर उसे अपने बच्चों की किलकारियों जैसा महसूस होता था। बच्चे भी ज्यादातर पेड़ की छांव मे ही अपना बसेरा बनाये रहते थे। गर्मी की तपती दुपहरिया में पेड़ की छांव में बहती बयार कलगू के भीगे बदन को अपने गर्म हवा से भी सुखाकर आराम देता, शाम होते ही तपती-जलती हवा जब ठंड़ी हवा में बदल जाती, तब पेड़ की छांव तले गुट्टक, गुल्ली-डंडा और आँखमिचौली खेलने में बच्चों को बहुत मजा मिलता था। ठंड़ी के मौसम में धूप-छांव के आँखमिचौलियों के बीच जब पेड़ की छांव में कलगू का परिवार बैठता, तब कलगू का पोर-पोर पल्लवित होकर असीम सुख-शांति का अनुभव करता था। पेड़ की डाल पर पड़े झूले झूलकर सारे बच्चे बहुत आन्नदित होते। पूर्वजों की निशानी को सहेजते हुए कलगू बहुत संतुष्ट था।


पर समय सदैव ऐसे लोगों की कठोर परीक्षा लेता है। कलगू पर भी मुसीबतों का पहाड़ टूट पड़ा। कलगू के भाई सरजू को जब कलगू की  खुशी बर्दाश्त से बाहर होने लगा, तब उसने जायदाद की लड़ाई का बिगुल बजा दिया। घर और पेड़ सहित आसपास की जमीन के बटवारे में कलगू को किसी एक पर अपना हक जमाना था। न चाहते हुए भी कलगू ने मकान को चुना, क्योंकि मकान के बिना कलगू का परिवार सड़क पर आ जाता। कलगू के पास मकान के अतिरिक्त रहने का न कोई ठिकाना था और न आसरा। नया घर बनाकर बसाना उसके हैसियत में नहीं था। इसलिए बुझे मन से उसे अपना पुस्तैनी पेड़ और वहाँ की जमीन भाई को सौंपना पड़ा। 

चूंकि सरजू की नियत पहले से ही ठीक नहीं था इसलिए वह शीघ्र ही पेड़ को कटवाने की योजना बनाने लगा। कलगू से यह देखा नहीं गया। वह भाई से अनुनय विनय करके पुर्वजों की दुहाई देता रहा, पर उसके निर्दयी भाई सरजू पर इसका कुछ असर नहीं हुआ। वह रोज पेड़ की एक शाखा को काटता और बाजार में बेच देता। कलगू पेड़ को कटता देखकर रोज रोता था और अपने भाई से प्रार्थना करता और पेड़ को न काटने की मनौवत करता। हरहराता और लहराता पेड़ ठूंठ बनने की कगार पर आ गया। पर भाई सरजू पर पेड़ काटने का भूत ही सवार था। 

पेड़ काटने में सरजू का बड़ा बेटा मोहन उसका साथ निभाता था, पर छोटा राघव अपने ही खेल में मगन व व्यस्त रहता। सरजू उसे सदैव डाटता और जलील करता था, कहता," दिनभर निठल्लों की तरह आवारागर्दी करता है, नालायक-बत्तमीज लड़का। ये नहीं होता कि अपने भाई मोहन से ही कुछ सीख ले।"

पिता सरजू की यह डाट राघव के दिल में सदैव चुभती थी। वह चिढ़ता था। इसलिए वह कभी मोहन के साथ काम करके सरजू की मदद नहीं करता था।

एकदिन कलगू खेती का काम करके लौटा तो देखा कि राघव पेड़ के बचे हुए टहनी पर उलटा बैठा पेड़ की डाल को काट रहा था। यदि डाल पूरी तरह कट जाती तो राघव गिरकर गम्भीर रुप से चोटिल हो जाता। कलगू, राघव से अनुरोध कर रहा था कि वह पेड़ को न काटे और उतर जाए, वरना वह गिर जायेगा। 

पर राघव बोला," चच्चा, आप कुछ बोलिए मत। मेरे बापू तो रोज पेड़ काटते है। आप उनको कुछ नहीं कहते है। आज मैं काट रहा हूँ तो आप को क्यों साप सूंघ रहा है।"

" बेटा, मैं इसलिए कह रहा हूँ कि तुम डाल पर उल्टा बैठे हो। डाल कटेगी तो तुम भी गिर जाओगे।" कलगू राघव को समझाते हुए बोला।

"नहीं, मैं नहीं आऊंगा। मेरे बापू मुझको निकम्मा कहते है। आज मैं यह डाल काट कर उन्हें जताना चाहता हूँ कि मैं उनका निकम्मा बच्चा नहीं हूँ। मैं भी मोहन भैया की तरह कुछ अच्छा काम कर सकता हूँ।" राघव डाल काटना भूलकर कलगू को जवाब देने लगा।

"नहीं, तुम तो हम सबके राजा बेटा हो। तुम नीचे आ जाओ। कोई तुम्हें कुछ नहीं बोलेगा। मैं तुम्हें मिठाई खिलाऊंगा।"

"चच्चा, मैं अभी नीचे नहीं आऊंगा, मैं तो यह डाल काटकर ही रहूंगा। मुझे तो यह काटकर बापू को बताना है कि मैं भी उनका लायक बेटा हूँ और कुछ अच्छा काम कर सकता हूँ।" 

"पर बेटा, तुम पहले डाल पर सीधे तो बैठ जाओ, फिर डाल काटना। मैं तब तुमसे कुछ नहीं कहुंगा।"

"ये सीधा-उलटा क्या होता है चच्चा, मैं नहीं जानता। मैं तो जैसे बैठा हूँ, वैसे ही बैठकर डाल काटूंगा। आप चाहे जो सोचे या कर लें।" राघव जिद पर अड़कर बोला। उसका उल्टा बैठना, यह दर्शा रहा था कि वह मंद बुद्धि का बालक है।

कलगू राघव को बातों में उलझा रहा था। कलगू राघव को मनाकर नीचे उतारने में लगा था, पर उसका बेटा गोलू दौड़कर सरजू के पास पँहुच गया, और सरजू से बोला," बड़े बापू, जल्दी चलो। राघव भैया पेड़ की डाल पर उल्टा बैठकर उसे काट रहे है। यदि वे डाल काट देंगें तो गिर जायेंगे।"

"चलो, देखते है, मेरा यह बुद्धु-नालायक बेटा आज क्या गुल खिलाने वाला है?" यह कहकर बड़बड़ाते हुए सरजू जल्दी से  राघव के साथ दौड़ते हुए कलगू के घर की तरफ चल दिये।

सरजू और कलगू के प्रयास से राघव को नीचे उतारा गया। सरजू कलगू के हाथों को थामकर बोला,"भाई, माफ कर दो मुझे। पेड़ काटकर मैं अपने ही पैर में कुल्हाड़ी मारने जा रहा था। तुम पुस्तैनी पेड़ के रक्षक थे और मैं उसका भक्षक बनने जा रहा था। आज राघव को कुछ हो जाता तो मैं क्या करता। तुमने राघव को बचा लिया, यह बहुत बड़ा उपकार है।"  

"मुझे शर्मिंदा न करो, भैया। राघव मेरा भी बेटा है।"

" नहीं भैया, मुझे अपनी गलती का एहसास हो गया है। हमें अपने पेड़ों को नष्ट नहीं करना चाहिए। आज से इस पेड़ के मालिक तुम ही हो। यदि बचा सको तो इस पेड़ को अब भी बचा लो। अभी इसमें जीवन बचा है।"

" आपकी सोच समय रहते सही हो गई, भैया। मुझे बहुत खुशी हुई। मैं इस पेड़ को अपनी मेहनत और लगन से सींचकर जरूर बचाने की कोशिश करुंगा, भैया।"

राघव खुश था कि उसके कारण आज बापू और चच्चा एक हो गये। पेड़ भी बच गया। और अब वह भी इस पेड़ के नीचे अपने चचेरे भाई-बहनों संग खुलकर खेल सकेगा क्योंकि दोनों परिवार की कटूता उन्हें आपस में मिलने नहीं देती थी। आज यह दूरी भी समाप्त हो गई।

सरजू की नादानियों की तरह ही हम आज अपने पुराने वृक्षों और जंगलों को काटकर अपने पैर में कुल्हाड़ी मारते है। और पर्यावरण के विपरीत किए गये गलतियों का खामियाजा भुगतते है, पर अपनी आँखें नहीं खोलते है। 

यदि हम समय रहते अब भी नहीं सुधरे तो हमें पर्यावरण के विरुद्ध अपने किए गये दुश्वारियों का फल जल्दी ही भुगतना पड़ेगा।




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