ईर्ष्या बसी है मेरे मन में (व्यंग्य)

मैं टहलती हूँ, घूमती हूँ। मॉल, रेस्टोरेंट और किटी पार्टी में जाती हूँ, जिससे बिंदास रहने की भरपूर कोशिश करती हूँ...पर मैं वैसे खुश नहीं हो पाती हूँ, जैसे औरों को खुश देखती हूँ। मैं क्यों खुश नहीं हो पाती हूँ..यह त्वरित सतर्क होने वाली बुद्धि के समझ से परे है...क्यों परे है? यह समझना मैं चाहकर भी समझ नहीं पाती हूँ। क्योंकि मैं उलझती हुई, कभी न स्वयं को देखती हूँ, न कभी स्वयं को तौलती हूँ और न मनन कर पाती हूँ। यह इसलिए भी होता है क्योंकि मेरी निगाहें हमेशा दूसरों पर टीकी रहती है। तभी मेरी आँखें तो टुकुर-टुकुर निहारती है, परखती हैै...दूसरे के वस्त्रों को, दूसरे के पर्स को, दूसरों के मेकअप को, दूसरे की खूबसूरती को और दूसरे की खुशी और चहचहाती हुई खनकती व गूंजती आवाज को। तब मैं उसे स्वयं से तुलनात्मक रूप से तौलती हुई जलती हूँ, कुढ़ती हूँ और कुड़बुड़ाती हूँ। क्योंकि उस समय मैं लबरेज होती हूँ, ईर्ष्या नामक ज्वलनशील पदार्थ से। तभी तो भभकते और जलते हुए दिल के ताप को आँखों की नमी भी शांत नहीं कर पाती है। तभी तो मैं मगन व व्यस्त रहती हूँ...दूसरों के गतिशील हावभाव और क्रियाकलापों में।
 ऐसे में मेरे पास वक्त ही वक्त होता है। तभी तो मैं इसी उंधेरबून में हमेशा विचरती हुई फँसी रहती हूँ। दूसरे कामों में मेरा मन  लगता नहीं है। क्या करु...कैसे अपने मन को समझाउं ...कैसे इस लत को छुड़ाउं... क्योंकि मन तो अपने बस में होता ही नहीं। वह बरबस खिंचा रहता है..दूसरे की गतिशील हावभाव और  क्रियाकलापों में।
 
दिन ऐसे ही बीत रहा था कि एकदिन अचानक कनॉट प्लेस के भीड़ भरे माहौल में अपने बचपन की सहपाठिनी उर्वशी से मेरी मुलाकात हो गई। चेहरे पर वही मुस्कुराहट, वही बिंदास हँसी...जिसकी मैं उस समय कायल थी। जिससे मैं मन ही मन में ईर्ष्या वश चिढ़ती थी। इसीलिए कभी उसके और अपने बीच की खाई को पाट नहीं पायी। पर हमेशा उसे निहारती थी, टटोलती थी कि कैसे अपने गमगीन भरे माहौल में भी वह मुक्त है अपने माहौल से, अपनी परिस्थितियों से, अपनी कमियों से और अपनी गरीबी से। बेहद गरीबी में पढ़ी बढ़ी वही उर्वशी एक खनकती हुई आवाज में मुझे पुकारी तो मैं चौंककर चारों तरफ नजरें दौड़ाने लगी, तभी वह पीछे से कंधें पर धौल जमाते हुए बोली," अरे, कहाँ ढ़ूढ़ रही हो? मैं तो तुम्हारे पास ही खड़ी हूँ।"
"ओह तुम, तुम यहाँ कैसे?" मैं अचकचा कर बोली।
"क्या मैं यहाँ नहीं हो सकती? अरे मैं यहीं रहती हूँ। मैं यहाँ के एक अस्पताल में डॉक्टर हूँ।"

उर्वशी और डॉक्टर? मैं गश खाने को हुई कि तभी उसकी कूकती आवाज फिर गूंजी," अरे कहाँ खो गई। चल मेरे घर चल, वहीं बैठकर बातें करेंगें।"
मैं किंकर्तव्यविमूढ़ सी उसके पीछे-पीछे चल दी। उसके कार में बैठते हुए शर्म से पानी-पानी हो रही थी। कार की चालक वही थी। बगल में बैठी हुई आज उसकी मोहनी-कूकती हँसी मुझे चिढ़ा नहीं रहीं थी, बल्कि प्रेरित कर रही थी। अपनी परिस्थितियों से जुझने वाली बिंदास लड़की..ऊँचाइयों पर पँहुचने वाली लड़की आज अपनी सादगी में बहुत महान दिखने लगी।
मैं बरबस पूछ बैठी," तू इतनी बिंदास कैसे रहती है? सूरज की गर्मी हो, सर्दी की शीतलता हो, भीषण बरसात हो या पतझड़ की खनकती गूंज हो..तेरे चेहरे पर कोई असर ड़ालता क्यों नहीं है? यह कैसे सम्भव है...जरा मुझे भी तो इसकी गूढ़ता  समझा।"
मेरी रोनी सूरत देख वह और जोर से हँस पड़ी, बोली," अरे यह जरा भी कठिन नहीं है। बिंदास रहने का एक ही मूलमंत्र है...कभी दूसरे पर तुलनात्मक दृष्टि डालो नहीं। यह तभी सम्भव है...जब तू स्वयं में मगन या खुश रहती है। अपने परिस्थितियों में, अपने माहौल में स्वयं डूबे रहो, तुलना न करो तो खुशी अपने आप तुम्हारा दामन थाम लेगी। तुम्हें जरूरत ही नहीं पडेगी उसे आमंत्रण देने की।"

"तू ठीक कह रही है। मैं दूसरे की खुशी नापने में सदैव व्यस्त थी इसलिए मुझे अपनी खुशी पाने और महसूस करने की कोई ललक हुई ही नहीं। मैं चिढ़नें में, जलने में समय गवां दी। आज तुझे देख आँखें खुल गई। पर अब क्या हो सकता है? समय तो चूक गया।"
"अरे, समय कभी चुकता नहीं है। जब जागों तभी सबेरा है। खुश रहने के लिए अपने परिस्थितियों से समझौता करना पड़ता है, रास्ता निकालना पड़ता है, जुझना और उठना पड़ता है। ऐसे में खुश रहो, बिंदास रहो और लक्ष्य का पीछा करो। पर दूसरों पर तुलनात्मक दृष्टि भूलकर भी न डालो..वरना रास्ता भटक जायेगा, फिर मंजिल कहीं नजर नहीं आयेगा।"
अचानक कार रोककर वह बोली,"चल घर आ गया। घर में बैठकर बातें करते है।"
उर्वशी के घर से लौटते हुए मैं बहुत संतुष्ट थी, खुश थी, बिंदास थी। वर्षो से ईर्ष्या के ताप से जलता मेरा तन-मन उर्वशी के सम्पर्क की शीतलता से पिघलकर शांत व सरल हो गया। ऐसी सादगी, ऐसी सरलता। उथल-पुथल का कोई नामोंनिशान नहीं। उसने मेरा दिल जीता ही नहीं, बल्कि बदलने की तरफ रुख मोड़ दिया। सकारात्मक सोच की तरफ बढ़ता मेरा पहला कदम मुझे बहुत भला और सुकून देने वाला लगा।

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