मेहमाननवाजी (संस्मरण)

अपनी बेटी की शादी में मैं बहुत उत्साहित थी। अतः उमंग व उत्साह से लबरेज होकर अपनी जिम्मेदारियों को निभाने में मैं काफी व्यस्त हो गई थी। शादी वाले दिन बारात आने से पूर्व मैं जल्दी से तैयार हो कर सबसे पहले पंडाल में पहुँच गयी ताकि वहाँ आने वाले सभी मेहमानों की खातिरदारी मैं अच्छे से कर संकू।
पंडाल में पहुँचकर मैं वहाँ आने वाले प्रत्येक मेहमानों को चाहे वे किसी भी पक्ष के या किसी भी आयु वर्ग के हो..हँसकर अभिनंदन करती और फिर उनको सम्मान पूर्वक अंदर लाकर बैठने का और नाश्ता करने का अनुरोध करती। कभी-कभी खुद बैरे से लेकर किसी को कुछ खाने या पीने के लिए पकड़ा देती। कहने का तात्पर्य यह है कि उस समय मैं सिर्फ आने वाले आगंतुकों को अपना अतिथि व आदरणीय मानकर ही आदर-सत्कार करने में जुटी रही।
उस समय मैं काफी व्यस्त थी। इसलिए इस बात से अनभिज्ञ थी कि किसी की सतर्क नजरें मेरी गतिविधियों पर अपनी सूक्ष्म व सघन दृष्टि जमायें हुए है।
फुर्सत के समय जब मैं अपनी प्रिय दोस्त के पास आकर बैठी, तो वे बोली," आज मैं तुम्हारे अतिथ्य से अति प्रभावित हुयी हूँ। अपनी बेटी की शादी में मैं किसी की सलाह मानकर ऐसा व्यवहार करने से चूक गयी थी। क्योंकि उनके अनुसार मेहमानों द्वारा भेदभाव महसूस करने पर कोई मेहमान किसी भी रुप में नाराज हो सकता था। अतः मैंने तटस्थ भाव अपनाकर किसी में कोई रुचि नहीं दिखाई, जिसके कारण कोई मेरे व्यवहार में पक्षपात करने का आरोप न लगा सके और उसको नागवार भी न लगे। 
पर तुम्हारी दोनों पक्षों से एकरुपता और एकरसता की भावना से 'हँसना, बोलना और पूछना' ने मेरी आँखें खोल दी और मुझे प्रभावित भी की है। अतः अपनी दूसरी बेटी की शादी में मैं भी तुम्हारा अनुसरण करके अपने इच्छानुसार मेहमाननवाजी करके मैं अपने इच्छा की पूर्ति करुंगी।"
दोस्त की बातों से मुझे भी अति प्रसन्नता का अनुभव हुआ कि मेरी सहेली को अपनी दूसरी बेटी की शादी में अपनी भूल सुधारने का एक मौका मिलेगा और तब उनकी इच्छा की पूर्ति होकर उन्हें संतुष्टि मिल जायेगी। 
 

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