मास्क की दास्तान (लघुकथा)

दो मास्क दोस्त एकदिन अचानक मिल गये जब उनके मालिक उन्हें मेज पर छोड़कर कहीं बाहर बातें करने चले गये। मास्कों को मौका मिल गया। वे आपस में बातें करने लगे।
पहला मास्क बोला," यार, ये आदमी लोग भी बड़े विचित्र जीव है। कहने को तो ये हमें मुँह पर चिपकाये रहते है, पर गाहेबगाहे जब किसी से मिलने, बातें करने या कुछ खाने लगेंगे तो बीच सड़क पर हमें परे खिसकाकर अपने काम में जुट जाते है। उस समय उन्हें सावधानी की कोई जरूरत नहीं रहती है, जबकि खतरा उसी समय होता है। अब इन्हें ही देख लो, बातें करने गयें है, पर हमें छोड़कर जैसे इस समय इन्हें हमारी जरूरत नहीं है।"
"हाँ यार, मैं भी आदमियों के इस लापरवाही भरे व्यवहार से उब चुका हूँ। जब किसी को दिखाना होता है, तो मुँह पर चिपका लेंगे। बाकी समय में हमें गले में लटकाकर ऐसे ही स्वच्छंद घुमेंगें,जैसे इन्हें हमारी जरुरत ही नहीं है। और जब कोरोना बीमारी में फँसेंगे, तो सारा दोष हमीं पर मढ़ देंगें कि मास्क ही खराब था, वरना हमने तो सावधानी में मास्क मुँह पर चिपकाया ही था।" दूसरा वाला मायूस होकर बोला।
"हाँ दोस्त, मैं भी इनके मुँह पर चिपके-चिपके बोर हो चुका हूँ। सोचता हूँ कब इनके दोहरी नीति से छुटकारा मिलेगा? या तो ये हमारा उपयोग ठीक से करें , तभी तो हम इनकी रक्षा कर पायेंगे वरना ये हमें अपने मुँह से ही हटा दें।"
" यार, हमें छुटकारा जल्दी मिलने वाला नहीं है। क्योंकि ये सुरक्षा का जबतक पूरा पालन नहीं करेंगें, तबतक कोरोना भागेगा नहीं। इसलिए नियति का खेल समझकर इनके अंगुलियों पर नाचते रहो और जितना हो सके इनकी सुरक्षा करो। यही हमारा कर्तव्य है।" दूसरा वाला मास्क समझाते हुए बोला।
तभी मास्कों की बोलती बंद हो गई, क्योंकि उसी समय उनके मालिक आकर उन्हें अपने मुँह पर चिपकाकर अलग-अलग रास्तों पर जा चुके थे।
 

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