बचपन की बगिया में आम का पेड़ (संस्मरण)

बचपन हमारे जीवन का मधुबन होता है। तभी तो मन बार-बार दौड़कर वहाँ पहुँच जाता है। बसंत ऋतु के आगमन पर बौर से बौराये पेड़ जब अपने पूर्ण यौवनावस्था में हवा के झोंकों से लहराते हुए झूमते है तब उनकी ओर आकर्षित हुए बिना रहा नहीं जाता है।
ऐसी ही एक सुहानी-लुभावनी शाम को  मैं अपने बरामदें में बैठी हवा का लुफ्त उठा रही थी कि तभी पड़ोसी के आम के पेड़ से टपकती अमिया की टप -टप आवाज कानों से टकरा गई। मैं लपककर मैं बाहर आई और गिरे हुए अमिया को अपने आँचल में बटोर लाई। उम्र के लिहाज को मैं भूल गई, पर आँचल में पड़े अमिया को देख मैं सोच में पड़ गई कि इन अमिया को यूं बटोरने का क्या फायदा है, क्योंकि अमिया बटोरने की प्रतिस्पर्धा करने वाले अब वे साथी ही नहीं थे, जैसा कि बचपन में हुआ करता था। लेकिन भ्रम में जीना या यादों के भंवरजाल में खोये रहना मानव की सहज  वृत्ति होती है।
आज भी बसंत के आगमन पर जब आम का पेड़ बौर से भर जाता है और धीरे-धीरे अमिया से लदने लगता है, तब मेरा मन भी अंगड़ाई लेता हुआ बाबुल के उस बगिया में पहुंच जाता है, जो आम के पेड़ों से भरा था और जिस पर इस मौसम में छोटे-छोटे टिकोरे लटके दिखते थे। वह बगिया हमारे दौड़ने-भागने, पेड़ों पर चढ़ने-उतरनें और छुपनछुपाई खेलने का रंगमंच था। वहाँ हम बेखौफ अपना बहुत समय  बिताते थे। माँ को भी हमारे खेलने से कोई परेशानी नहीं थी, क्योंकि उतने समय उन्हें भी हमारी उधमबाजी से छुटकारा मिल  जाता था।
मेरे दोस्तों में सुबोध नाम का ऐसा सहपाठी कम साथी ज्यादा था, जिससे मेरी कभी बनती नहीं थी। पर हमारा अधिकांश समय एक साथ ही व्यतीत होता था। सुबोध की एक आदत मुझे बहुत बुरी लगती थी, पर लाख मना करने के बावजूद भी वह उसे करने से बाज नहीं आता था। बात-बात में अकड़ दिखाना, रौब गाँठना और जीत के कारण हर पल  गौरान्वित होने वाले गुरुर में ऐंठना उसकी आदतों में शामिल था। वह हर बात में मुझे चिढ़ाने, चुटिया खींचकर परेशान करने, पीठ पर धौल जमाकर मुझे छोटा साबित करने की कोशिश में रहता था। मैं हारती, बड़बड़ाती, लड़ती, झींकती और टसूए बहाती रहती। ऐसे में एक चाह मेरे मन में हरपल कुड़बुड़ाती कि कब सुबोध को हराकर जीत का जश्न मनाऊं।
पढ़ने में तो मैं उसे कभी पछाड़ नहीं पाई, इसलिए कोशिश यही रहती कि उसे अमिया बीनने में कभी आगे बढ़ने न दूं। लेकिन सुबोध यहाँ भी कोई मौका गंवाना नहीं चाहता था, इसलिए कहीं भी अमिया टपकने पर वह मुझसे पहले पहुँचकर अमिया लपक लेता और मैं खिसियाई बिल्ली की तरह खंभा नोचनें लगती। उसे मुझे चिढ़ाकर, हराकर, मेरी रोनी सूरत देखने में जो मजा आता था, उसकी व्याख्या मैं नहीं कर सकती। पर बाद में जब मासूम सा चेहरा  बनाकर और अपने दोनों कानों को पकड़कर मुझे मनाता,सॉरी बोलता और सारी बीनी हुई अमिया मेरे झोली में डालने को आतुर दिखता, तो मेरा गुस्सा भी क्षणभर में छूमंतर हो जाता। मैं हँसती-मुस्कुराती हुई अमिया स्वीकार करती और फिर आँखें नचाती, उसे अंगूठा दिखाती वहाँ से रफ्फूचक्कर हो जाती। मेरी फ्राक अमिया के बोझ से लदी होती , लेकिन इसके बावजूद सब बहुत अच्छा लगता था।
      बचपन की ये यादें कभी भूल नहीं पाई। आज भी आम के पेड़ से गिरी अमिया को उठाने से अपने को रोक नहीं पाती हूँ या अमिया से लदे पेड़ के नीचे ललचाई आँखों से अमिया टपकने की आस में  पलभर ठिठकना नहीं भूलती हूँ। पापा के ट्रांसफर के बाद वह घर, वह आंगन और वह बगिया सब छूट गया , लेकिन उस बगिया में खेलते हुए जो बचपन बीता, वह आज भी एक ऐसी जगह है , जहाँ मैं तब जाकर बैठ जाती हूँ , जब मेरा मन स्मृतियों में खोकर मुस्कुराने को होता है।

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