गुब्बारा दुबारा मिल गया (संस्मरण)

मैं (रेनू) अपनी बेटी शालू के परिवार, समधिन सुमन और पति के साथ जयपुर घुमने गई थी। 
शाम के समय जब हम घूमकर वापस होने को हुए, तब हम लोग खचाखच वाहनों के आवाजाही से व्यस्त जयपुर की सड़क के फुटपाथ पर चहलकदमी करते हुए अपने होटल की तरफ बढ़ने लगे। अचानक नाना की अंगुली थामें चल रही नन्हीं नातिन अनुष्का के हाथ से बड़ा वाला गुब्बारा छूटकर उड़ गया। 
"मेरा गुब्बारा?" कहकर रोने को आतुर अनुष्का अपने गुब्बारे को कौतुहलवश उड़ते हुए देखने लगी  और रोना भूल गई। आगे चल रहे शालू-अमित और पीछे चल रही सुमन और मैं भी उड़ते गुब्बारे में रम गये क्योंकि उँची उड़ान भरता हुआ गुब्बारा कभी किसी वाहन से टकराता तो कभी किसी से।
हम लोग उत्सुकतावश उसके मस्त-मस्त उड़ान का मजा लेते हुए इस उम्मीद में नजरें टिकाए थे कि गुब्बारा अब फुटा कि तब...पर गुब्बारा फुटा नहीं, बल्कि वाहनों के उपर उसे छूने को मचलता हुआ कभी इस वाहन से तो कभी उस वाहन से टकराता हुआ अठखेलियाँ करता रहा।
हम आगे बढ़ने को हुए कि अचानक गुब्बारा अपना रुख बदला और हमारे ही तरफ उड़ता हुआ वह हम लोगो से बीस-पच्चीस कदम पीछे फुटपाथ पर आ गया।
अपने पँहुच के दायरे में गुब्बारा को देखकर सुमन जी गुब्बारे की तरफ लपकी। उन्हें गुब्बारा मिल जायेगा यह सोचकर हम आगे बढ़ने लगे। 
वे आ रही है...यह देखने के लिए मैं एकाएक पीछे मुड़ी तो देखा कि उनके हाथ से छूटा गुब्बारा ठीक मेरे पीछे था। आश्चर्यचकित मैं गुब्बारा को झटपट लपककर पकड़ ली।
        वह गुब्बारा जो छूटकर लम्बी व उँची उड़ान के कारण अपने पहुँच के दायरे से बाहर जा चुका था...वह फिर इतराता हुआ मेरे हाथों में आ गया, तो हम स्तब्ध हो गये। "वाह...क्या ऐसा भी हो सकता है?" यह सोचते हुए हम इस अप्रत्याशित अनहोनी घटना के अलौकिक, आंतरिक असीम आंनदमय अनुभूति में ड़ूबे हुए आगे बढ़ गये।
 

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