सपने तंग करते है (लघुकथा)

अवनी सरकारी स्कूल में अध्यापिका है। अनलॉक काल में उसे स्कूल प्रतिदिन जाना पड़ता था। स्कूल की चाभी उसी के पास था, अतः वह समय पर स्कूल पँहुच जाती थी।स्कूल में बाउंड्री था नहीं। अतः कमरे का ताला खोलते ही आस पास के बच्चे मचलते और उत्साहित होते हुए न जाने कहाँ से आकर उसको घेरकर खड़े हो जाते। 
वे उत्सुक निगाहों से पुछते है," मैम जी, क्या स्कूल खुल गया? हम अपना किताब-कापी लेकर क्या आ जाये?"
"नहीं, अभी स्कूल नहीं खुला है। तुम लोग घर जाओ। और मास्क लगाकर घुमो।"
यह सुनने के बाद भी जब बच्चे गये नहीं, बल्कि डटे रहे। अवनी कसकर धमकायी, तब वे पीछे मुड़कर खिसकने लगे।
 बच्चे चले गये। अवनी अपने काम में जुट गई। काफी देर बाद अचानक अवनी को लगा कि कमरे के बाहर कोई है। वह बाहर आयी तो खामोश रोहित को कमरों को निहारते देखकर वह दंग रह गयी। वह रोहित से बोली, "जाओं घर जाकर अपने पापा को भेज दो। मुझे उनसे काम है।"
रोहित बात को अनसुनी करके बोला," मैम, क्या मैं थोड़ी देर के लिए अंदर बैठ जाऊं।" 
रोहित के इस आग्रह पर अवनी द्रवित हो गई। वह बोली, "आओ, चुपचाप बैठ जाओ। पर किसी को पता नहीं चलना चाहिए।"
"मैम, एक कागज-पेंसिल दे दीजिए। मैं अभी आपको कखगघ लिखकर दिखाता हूँ।" रोहित की मासूमियत और उत्साह अवनी के दिल को छू गयी। वह रोहित को कागज-पेंसिल देकर  अपना काम करने लगी। रोहित जब लिख लिया तो अवनी के पास आकर खड़ा हो गया। अवनी झुझलाकर बोली,"चुपचाप बैठकर लिखते रहो, वरना घर भेज दूंगी।" 
रोहित चुपचाप बैठकर लिखने लगा।
थोड़ी देर बाद दूसरा लड़का गगन दरवाजे से झांकता है।फिर उत्साहित होकर बोला,"अरे, रोहित यहाँ बैठे लिख रहे हो। मैम, क्या मैं भी अपना किताब-कापी लेकर आ जाऊं? आपको परेशान बिलकुल नहीं करुंगा?"
"नहीं, स्कूल बंद है। तुम यहाँ बैठ नहीं सकते हो। जाओ, अब तुम दोनों घर जाओ, मुझे काम करने दो।"
रोहित मायूस सा गगन को खा जाने वाली नजरों से घूरते हुए बोला," तुम क्यों चले आये?"
"तुम लोग जल्दी जाओं, मुझे बहुत काम करना है।" 
अवनी बच्चों को बाहर तक छोड़ने आयी, ताकि वे दुबारा अंदर न चले आयें। 
रोहित बाहर निकलते समय अवनी से पूछा, "मैम, मैं क्या कल आ सकता हूँ?"
"नहीं, तुम आना मत, क्योंकि स्कूल अभी बच्चों के लिए बंद है, जब खुलेगा तब आना।" अवनी दोनों से बोली।
 
"मैम, मैं तो कब से परेशान हूँ कि ये स्कूल कब खुलेगा? मुझे स्कूल की बहुत याद आती है। अब तो मुझे स्कूल के सपने भी बहुत आते और तंग करते है।"
 
रोहित की मासूम दयनीय अकुलाहट देखकर अवनी विकल हो गयी। कोरोनाकाल की विवशता ने बड़े तो बड़े, मासूम को भी अपने जाल में जकड़ने से नहीं छोड़ा है।  सब इस समय बेचैन है कि कब इस कोरोनाकाल से छुट्टी मिलेगी और जिंदगी अपने पुरानी पटरी पर दौड़ने लगेगी। यही सोच इस समय की हकीकत है।
 

1 comment:

Shalini Raman said...

Behad sundar lekhni