विरासत में मिली कला का विस्तार (लघुकथा)

कालेज से लौटी मेहू खुशी से माँ रागिनी के गले में बाहें डालकर बोली,"माँ, मैं आज बहुत खुश हूँ। मेरी सहेली प्रिया, जो परसों घर पर आयी थी, वह आपकी कलाकृतियों से बहुत आकर्षित हुई थी। कह रही थी तुम्हारी मम्मी कितनी गुणी है? पूछ रही थी कि मम्मी ने कहाँ सीखा है? मैं तो बता नहीं पायी, इसलिए आज आप ही बता दीजिए कि आपने ये सब कहाँ से सीखा है?"
" मैं तो कहीं सीखने गई ही नहीं। जो सीखा, वह तुम्हारी नानी की देन है और उसमें मेरी अपनी रुचि व लगन और जुट गयी।"
"मैं मान ही नहीं सकती कि कोई घर पर रहकर इतना निपुण हो सकता है? यही कारण है कि आज मैं भी प्रिया के साथ एक कला केंद्र में नाम लिखवा ली हूँ। मुझे भी आपकी तरह ही घरेलू कला में निपुण होना है।"
" इसके लिए तुम लोगों को बाहर जाने की जरूरत ही क्या थी? इसमें तो मैं ही तुम दोनों को निपुण कर देती।" रागिनी मेहू की उत्सुकता देखकर बोली।
"आपके पास चूल्हें चौके से समय ही कहाँ बचता है? प्रिया सीखेगी, तो मेरी भी इसमें रुचि बढ़ेगी।" यह कहकर मेहू वहाँ से चली गई, तो रागिनी के चेहरे पर निराशा के भाव दिखने लगा।
समय बितता गया। एकदिन मेहू कालेज से जल्दी आ गयी तो रागिनी को घर पर न पाकर वह पड़ोस की रेखा ऑंटी के घर उन्हें बुलाने चली गयी। वहाँ उसने जो देखा,उससे उसकी आँखें फटी की फटी रह गई। रेखा ऑंटी के घर में माँ की बनायी जैसी ही कई पेंटिंग टँगी थी। इस समय रेखा ऑंटी एक साड़ी पर कढ़ाई कर रही थी और मम्मी से हँस-हँसकर बातें कर रही थी।
"ऑंटी, आप ये सब कब बना ली। मैं तो कला केंद्र में सीख रही हूँ, पर अभी तक एक मेजपोश भी नहीं बना पायी।"
 यह सुनकर रेखा बोली," मेहू बेटी, कुछ चीजें किताबों से नहीं, बल्कि विरासत से मिलती है। तुमने माँ के कला की कद्र ही नहीं की, तो मैंने सोचा कि तुम्हारी माँ के ज्ञान का लाभ मैं ही उठा लूं। मैं ही क्या, तुम्हारी मम्मी से तो और भी कई लड़कियाँ और औरतें बहुत कुछ सीखती है।"
"सच" ये कहकर मेहू अपने मम्मी के गले लगकर बोली," मम्मी, मुझे माफ कर दीजिए कि मैंनें आपके ज्ञान का कद्र नहीं किया। लेकिन मुझे आज आप पर गर्व बहुत हो रहा है कि आप अपने पराये के भेद के बिना ही अपनी कला का विस्तार करती रही।"
"बेटी,अपनी माँ से सीखे इन गुणों को मैं विरासत में तुम्हें और बहू को देना चाहती थी, पर तुम लोगों की इसमें कोई रुचि नहीं थी, तो मैंने तुम लोगों को छोड़ दिया, क्योंकि जिसमें लगन नहीं होता, उसे सिखाने से कोई फायदा नहीं होता। लेकिन मुझसे जो लगन से सीखने आता, उसे मैं इंकार नहीं कर सकती थी। मेरे माँ के ज्ञान का विस्तार तो होना ही चाहिए। वही मैं कर रही थी।"
"आप धन्य है मम्मी। आज से मेरा कला केंद्र जाना बंद। आज से मैं आपकी बेटी के साथ-साथ शिष्य भी हूँ। आप मुझे सिखायेंगी ना।"
मेहू के इस कथन पर हाँ कहते हुए रागिनी का पोर-पोर पुलकित हो गया।

No comments: