शंखनाद (कविता)

घायल मन की
मौन प्रतिज्ञा,
उग आती है
नैनों में।
करु कुछ ऐसा  
बंनू मैं वैसा,
चमक उठूं
जो जीवन में।

स्याह अधेंरा
लिपटा है तन में,
कांप रहा दिल
व्याकुल होकर।      
काल की 
कुटिल व्यवधान
बाँध रही है
जालें पैरों में।

उफानती है
बेताब नदियाँ,
भँवर में फँसें
तन्हाँ मन को।
हिलोरें लेती है
मंथन की लहरें,
क्षुब्ध मन के 
पागलपन में।

बहुत हो चुका
घोर निराशा,
बंधन मुक्तकर 
मन का द्वार खोलो,
उत्तेजित हो
चलो अकेले।
तभी बाँध सकोगे
जीवन को।

उद्घोष उत्तेजना 
होनी है उँची,
शंखनाद 
करनी है लम्बी।
तारें बन नहीं 
छिटकना है,
पूनम का चाँँद
बन दमकना है। 

नये संकल्पों
में बँधी जिंदगी
तोड़ देगी
नाकामी को।
कर्तव्यनिष्ठा के
आह्वाहन से,
स्वर्ग सा होगा
स्वर्णिम जीवन।।।।।
 

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