छुट्टी (बाल कविता)

गरमी की छुट्टी जब आती है,
खूब मजे लगाते है, मिलकर।
कभी दादी-नानी के घर जाते,
कभी सैर-सपाटे के मजे उठाते।

छुट्टी बीतते तब देर नहीं लगती,
हमें हमारी खुशी अधुरी लगती।
फिर आयेंगे जल्दी, कहते सबसे,
वादों के उमंग में, हम ड़ूबे रहते।

गर्मी की छुट्टी आयेंगी, जल्दी ही,
इसी धुन में पढ़ते है, दिन-रात।
दादी-नानी से मिलने की चाहत,
उमंगें भरते रहते, सुबह व शाम।

पर छुट्टी नहीं आती है जल्दी,
करनी पड़ती है, बहुत इंतजारी।
पर आया जब कोरोना का खौफ,
उसने करा दी स्कूल की छुट्टी।

देखों अब है, पूरी छुट्टी ही छुट्टी,
पर नहीं है ये वैसी मस्ती वाली।
पाबंदियों का है, बहुत झमेला,
नहीं की थी हमनें, ऐसी चाहत।

न दोस्त मिलें, न रिश्तेदार मिलें,
न पार्क खुलें, न मॉल खुल रहे है।
लम्बी छुट्टी, पर खुशी है गायब,
चेहरे की रौनक, नजर नहीं आती।

अब हम घर बैठे ,बोर हो रहे है,
कोरोना के डर से सटक गये है।
ऑन लाइन क्लास की आई बेला,
उसी को करके थोड़ा मजा उठाये।

न नानी-दादी का प्यार मिला, 
न मौसम का रंगीन मजा मिला।
तन-मन-धन से बेजार हुए है,
अशक्त और बेकार लग रहे है।

कैसे उबरेंगें हम इसकी मार से,
यही सोचकर उबरने में लगे है,
स्कूल खुलने की आस जगाकर,
हिम्मत अपनी उजागर करते।

नयी खुशी और नये उमंग से,
जीवन ज्योति जगाया है। 
पढ़ने व खेलने में मस्त होकर,
हमको आगे बढ़ते रहना है।
 

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