अकेलेपन का एहसास (कहानी)

अकेलेपन का दर्द महसूस करने वाला व्यक्ति ही इस  कष्टकारी पल के प्रति अपने अनुभव को व्यक्त कर सकता है। पर ऐसा जीवन जीने वाला व्यक्ति भी खुलकर इसके विरोध में मुँख खोलना नहीं चाहता है, क्योंकि मुँह खोलने पर जो शब्द निकलेंगे.. वह उसके अपनों को ही चुभेंगे। इसलिए संस्कारों में बँधा व्यक्ति अपनों को पीड़ा पँहुचाने वाले शब्दों का प्रयोग खुलकर नहीं करता। इसलिए ऐसी पीड़ा संदुचकी में बहुमूल्य धरोहर की ही तरह बंद रहती है। जो व्यक्ति के मौत के बाद खुलती है, पर दबे-छुपे फुसफुसाहट वाले जबानों में।
कालोनी के पड़ोस में अकेले रहने वाली धन्नों अर्थात धनवंतरी देवी का हालचाल जानने के लिए कामिनी बेचैन रहती थी। वह धन्नों के घर जब मन करता, तब ही चली जाती थी। वह तो धन्नों के पति राममोहन जी के जीवित रहते समय भी जाती थी और बोल-बतियाकर वापस आ जाती।
समय का फेर ही तो है, जो भरापूरा परिवार होने के बावजूद भी पति के बिना धन्नों के जीवन में ऐसा मोड़ आ गया, जब धन्नों स्वयं में नितांत अकेली हो गई। धन्नों बच्चों के पास रहने गई थी, पर जल्दी ही वापस आ गयी। कामिनी सोचने पर मजबूर हो गई कि धन्नों बच्चों के पास उनके किसी व्यवहार से दुखी होकर टिक नहीं पायी या उन्हें अपने घर की स्वतंत्रता खींच लाई। कामिनी जानती और समझती भी थी कि आजकल के बुजुर्गों के पुरानी और उनके बच्चों की नई पीढ़ी में अंतर आ गया है। आधुनिकता के नये दौर में बहने वाले बेटा-बहू अपने माँ-बाप से वह सामंजस्य नहीं बैठा पाते, जिसकी उम्मीद में बुजुर्ग वर्ग अब तक आश्वस्त था। और अब स्वयं बुजुर्गों की मनोस्थिति भी ऐसी हो गई है कि वे अकेले अपना स्वतंत्र जीवन जीना चाहते है, पर बच्चों के अधीन रहना नहीं चाहते। इसलिए वे अपने घर में अपने को ज्यादा सुरक्षित महसूस करते है। 
कामिनी इतना जानती थी कि परिस्थितियां चाहे जो हो, पर अकेला व्यक्ति तो अकेला ही होता है, इसलिए उसे सहयोग, सांन्त्वना और सहानुभूति की नितांत आवश्यकता होती है। यही सोचकर कामिनी गाहेबगाहे धन्नों के यहाँ अपनी उपस्थिति दर्ज करा देती थी।
धन्नो अपने पति के साथ अपने मकान के नीचले हिस्से में रहती थी। उपर दो किराएदार थे। एकदिन पति की तबीयत बिगड़ने पर धन्नो अपने दोनों बेटा को फोन की, बोली," बेटा, तुम्हारे पापा की तबीयत दिन पर दिन बिगड़ती ही जा रही है। अब सम्भाले सम्भल नहीं रहा है। तुम लोग जल्दी आ जाते तो ठीक था।"
बड़ा बेटा अनूप विदेश से बोला," अम्मा, घबड़ाओ नहीं। हम आने की कोशिश कर रहे है। मैंने चाचा को फोन कर दिया है। वे आप लोगों के पास शीघ्र ही पहुँच जायेंगे। छोटे भी जल्दी ही वहाँ पहुँच जायेगा।"
राममोहन जी के बीमारी में धन्नो के देवर अपनी पत्नी के साथ आ गये। अस्पताल के दौड़ा-दौड़ी के बावजूद भी राममोहन जी को बचाया नहीं जा सका। 
राममोहन जी के मौत के समय पूरा परिवार एकजुट हो गया। विदेशी बेटा विदेश से, दूसरा बेटा मुम्बई से और लड़की दिल्ली से आ गये थे। सभी बाल बच्चेदार थे, अतः उनके साथ उनके बच्चे भी थे। बच्चों के एकजुटता और चहल-पहल से आह्लादित होने वाला धन्नो का मन ऐसे समय में सिमट-सिकुड़ कर पीद्दी सा हो गया था। यदि यही परिवार राममोहन जी के जीवित रहते इकट्ठा हो जाता, तो आज राममोहन जी की आत्मा तृप्त होकर इस संसार से विदा हुई होती।
अकेले रहने वाले धन्नो और राममोहन जी इस कल्पना से कितने प्रफुल्लित होते थे कि कब वह मौका आयेगा, जब पूरा परिवार उनके आँखों के सामने होगा। राममोहन जी तो इन सपनों के भँवरजाल में डूबते-उतराते ही चले गये। पर धन्नो जो इस मंजर को चुपचाप देख और झेल रही थी..वह भी खामोश थी। लेकिन धन्नो आज मन ही मन में इस बात पर संतुष्ट थी कि चलो बच्चों ने इस दुखद बेला में अपनी उपस्थिति दिखलाकर उनकी नाक तो समाज के सामने उँची करके बचा ली।
राममोहन जी का क्रियाकर्म भली भांति सम्पन्न हो गया।
विदेश वाला बेटा जल्दी ही, मुम्बई वाला बेटा गाँव में होने वाली पूजा के बाद सपरिवार चले गये। बेटी माँ के साथ ही रहना चाहती थी, पर ससुराल में सास की तबीयत बिगड़ने के कारण वह भी ससुराल चली गई। धन्नों अपने देवर-देवरानी के साथ समय व्यतीत करने लगी। ऐसे विकट समय में भी धन्नो काफी दुखी होने के बावजूद अपने हिम्मत को हारने नहीं दी। बेटा-बहू फोन पर समझाते थे,"अम्मा, परेशान मत होना। हम बीच-बीच में आते रहेंगे। बस अपना अच्छे से ख्याल रखना।"
दुखों का पहाड़ झेल रही धन्नो कुछ कह नहीं पाती थी। सुबह-शाम माँ का हाल लेने वाले बेटों के सांत्वना ने धन्नों के मन को आश्वस्त तो किया, पर उसके दुखती रग पर मलहम नहीं लगा सका। 
कामिनी बीच-बीच में धन्नो का हालचाल लेने धन्नों के यहाँ धमक ही जाती थी। कामिनी जब भी धन्नो के घर जाती, वह धन्नो को व्यस्त ही पाती। पति के अनुपस्थिति में बीमार रहने वाली धन्नो के हौसला से कामिनी काफी प्रभावित थी। जबकि धन्नों अपने कमरदर्द, घुटने के दर्द से अत्यधिक पीड़ित थी। 
इसी बीच कोरोना वायरस के कारण  लॉकडाउन की घोषणा हो गयी। ऐसे एकाकीपन में धन्नों की कामवाली ही धन्नों की एकमात्र सहारा वाली विकल्प थी। उसने कोरोनाकाल के लॉकडाउन जैसे विपरीत परिस्थितियों में भी धन्नों का साथ नहीं छोड़ा था। जबकि ऐसे विकट समय में धन्नों के देवर व देवरानी अपने घर जा चुके थे।
 लॉकडाउन के विषम परिस्थितियों में जो जहाँ था, वहीं का होकर रह गया। कामिनी भी अब उतनी स्वतंत्रता से धन्नों के घर जा नहीं पाती थी, जितनी स्वतंत्रता से वे पहले जाती थी। कामिनी को धन्नों का एकाकीपन खलता था। तभी तो एकदिन हिम्मत करके वह धन्नों के घर पहुँच गयी। धन्नों बच्चों के बारे में इतना बतायी कि बच्चे बहुत चिंतित रहते है। वे प्रतिदिन शाम को फोन करके कुशलक्षेम पूछ लेते है। धन्नों बतायी कि बहू का फोन आया था। बहू कह रही थी,"मम्मी जी, आप पेपर बंद कर दीजिएगा। और हाँ, कामवाली को भी बुलाइयेगा तो केवल एक समय के लिए ही, क्योंकि ये कामवालियां ही कोरोना वायरस फैलाने में अपनी अहम् भूमिका निभायेंगी। इसलिए इनसे दूर रहिएगा। और ऐसे समय में कहीं बाहर भी नहीं निकलिएगा।"
धन्नों कामिनी से बोली," बहू के इतने निर्देशों के बाद भी मैंनें न तो पेपर बंद किया और न अपने काम वाली को। पेपर जब तक अपने आप बंद था, तब तक ही नहीं आया, फिर तो आने लगा।"
"ठीक किया आपने, जो इन्हें बंद नहीं किया।" कामिनी धन्नों को आश्वस्त करते हुए बोली।
"अरे, ये दोनों ही तो मेरे अकेलेपन के साथी है। इन्हें बंद करके मैं अपने पैर में कुल्हाड़ी नहीं मार सकती थी। मैंने बहू का कहना नहीं माना।"
" जो समझ में आये, आप वही कर सकती है। आप मेरे घर भी निसंकोच आ सकती है।" कामिनी बोली।
"आप तो जानती ही है कि दर्द के कारण मैं वैसे ही कम निकलती थी। इनके दोस्त रोज आते थे। बैठते बाते करते थे। नाते-रिश्तेदार भी गाहेबगाहे आ जाते थे। पर अब सबका आना बंद है। क्या करु। समय तो बिताना ही है।"
 समय बीतता रहा। एकदिन ढ़ेर सारे बड़े-बड़े अचार के जार को धूप दिखाने वाली धन्नो से कामिनी ने पूछा," भाभी जी, आप तो अचार खाती नहीं है। फिर इतने अचार का क्या करेंगी?"
"अरे, मैं अपने लिए अचार कहाँ बनाती हूँ। बच्चे आते है तो अचार, पापड़, चिप्स ले जाते है, तो बड़ी खुशी मिलती है। उन्हीं के लिए ही तो बनाती हूँ। तुम समझ सकती हो, इन बहुओं को अचार बनाने जैसे झंझटों से कितनी खुन्नस है। मैं न बनाऊं तो बच्चे इस पुरानी पारिवारिक परम्परा से कितने दूर हो जाऐं। यही तो नई और पुरानी परमपराओं को जोड़ने की डोर है। मेरे बच्चे तो शुरू से इन्हें खाने के शौकीन रहे है। उनकी तृप्ति में ही मेरी खुशी निहित है।"
"यह तो ठीक व सराहनीय है। पर आपके प्रति उनकी निष्ठा भी इतनी ही जवाबदेही होनी चाहिए, आपने कभी इसपर विचार किया है?"
"अरे, सोचकर क्या करुंगी। जो सामने है, उसी को झेलने में संतुष्टि खोजनी है।"
" आप बच्चों के पास चली क्यों नहीं जाती है?" कामिनी धन्नों को समझाते हुए बोली।
"अरे, मेरे लिए किसी के पास समय ही कहाँ है? जब वहाँ भी एकाकीपन ही झेलना है, तो यहाँ अपने मन की आजादी,सुकून व शांति तो ज्यादा है। जिंदगी भर अपनी मनमानी चलाने के बाद अब बंधन स्वीकार नहीं होता है।" धन्नों कामिनी को समझाते हुए बोली।
"फिर तो बच्चों का कोई दोष नहीं है।"
"अरे मैं कब कह रही हूँ कि बच्चे दोषी है? ये तो आपसी समझ है। जैसा जीवन मिले, उसे संतुष्टि से जीते जाना चाहिए।"
कामिनी उस दिन ठगी सी रह गई, जब वह धन्नों का गेट खोलकर अंदर आयी तो देखती है धन्नों जूते-चप्पलों के ढ़ेर के सामने बैठी उन्हें कपड़े से पोछकर सहेज रही थी। कामिनी को सामने पाकर वे बरबस बोल पड़ी, बोली," बच्चे जूते-चप्पल छोड़कर चले जाते है। भुकड़ी लग रही थी। उसी को साफ करने बैठ गयी।"
"धन्य है, आप। आपका पुत्रों के प्रति प्रेममोह देखकर मन द्रवित हो जाता है।" 
"क्या करु? यदि ये सब न करु तो समय काटना कठिन हो जाता है। बच्चों का सामान सहेजने से लगता है, उन्हें ही सँवार रही हूँ। जैसे वे मेरे पास ही है।"
कामिनी धन्नों को हमेशा जागरूक और जीवंत ही देखती थी। कभी उनकी आँखों में आँसू की कोई बूंद टपकती हुई  नहीं दिखी। मन के कोलाहल को वे मन में ही दबाएं कभी पेड़ों में पानी डालते दिखती , तो कभी गमलों को ठीक करती रहती।
पर उस दिन धन्नों बेचैन और दुखी थी, जब बेटी के ससुर के मृत्यु के शोक में ड़ूबी बैठी थी। उस दिन उनकी व्यथा बता रही थी कि आज वह कितनी अकेली और अशक्त हो गयी है, जो बेटी के दुख के समय बेटी के पास पहुँच भी नहीं पा रही थी। पहले वे अकेले कहीं भी आ जा सकती थी, पर इस कोरोना काल में सब अपने लोकल रिश्तेदार भी दूर हो गये थे। मन छटपटाकर उनका रह गया था।
 एकदिन वे बोली,"अबकी हमनें पेड़ का आम भी किसी के घर नहीं भेजा। सबने कह दिया अबकी जाने दीजिए। कौन जायेगा आम लेने। एक देवर बोले थे,'भाभी जी बाहर ही झोले में रख दीजिएगा। बेटा को भेज दूंगा। वही लेता आयेगा।' मैंने वैसा ही किया।"
"ठीक किया आपने।"  कामिनी कुछ देर बैठकर बातें की, फिर लौट आयी।
एकदिन तो धन्नों बहुत दुखी थी। वे बोली," मेरे जेठ की लड़की का फोन था। कह रही थी घुटने में काफी तकलीफ है। आपरेशन करवाने की सोच रही हूँ। इसलिए लखनऊ आना चाहती हूँ। मैंने मना कर दिया था कि लखनऊ की हालत खराब है, डॉक्टर मिल नहीं रहे है और यहाँ कोई दौड़ धूप करने वाला भी कोई नहीं है। दो दिन बाद उनके मौत की खबर आ गई। मुझसे तो दो दिन खाया भी नहीं गया।" यह सुनकर। कामिनी धन्नों को समझाती रही।
एकदिन अपनी संदुचकी खोले नन्हें नन्हें कपड़ो को सहेजती, चूमती और गले से लगाती भावविह्वल धन्नों का रुप देखकर कामिनी को खुन्नस आ गया। वह आग्नेय नजरों से धन्नों को घूरने लगी, जो माँ अपने बच्चों की यादों को इतने प्रेम से सहेज कर रखी है, वह अपने बच्चों को कितने प्यार से पाली होंगी। अतः वह चिड़चिड़ाती हुई बोली,"धन्नों, इन पुराने कपड़ों में क्यों सर खफा रही हो? इनसे बाहर निकलो। जिन बच्चों को तुम्हारी चिंता नहीं, उनकी यादों को सहेजने से क्या फायदा?" 
धन्नों कामिनी को शांत नजरों से घूरती हुई बोली,"कह तो तुम ठीक ही रही हो। अब आखिरी बार इन्हें सम्भाल रही हूँ। जीवन का क्या भरोसा? थक गई हूँ बहुत, इसलिए अब विश्राम करना चाहती हूँ।"
एक अकेली माँ जीवन के सांध्य बेला में भी बच्चों के प्रति समर्पित रहती है, वहीं बच्चे माँ की उन भावनाओं की कद्र भी नहीं कर पाते, जो माँ अपने तरीका से सोचती और जीना चाहती है।
एकदिन धन्नों के बॉथरुम में फिसलकर गिरने की खबर सुनकर कामिनी दौड़ती-भागती धन्नों के घर पहुँच गयी। धन्नों के किराएदार धन्नों को अस्पताल में भर्ती करवा दिए थे। बच्चों को खबर हो गई। मुम्बई वाला बेटा और दिल्ली से बेटी आ गई। होश में होने पर धन्नों कामिनी से बोली," बच्चों को मेरी कितनी चिंता है? एक ही खबर पर आ गये। बड़ा वाला भी विदेश से आ जाता, तो सबको नजरभर देखकर पूरी शांति से विदा हो जाती।"
विदेशी बेटा की राह देखती धन्नों इस दुनियाँ से विदा हो गई। वह आया, पर धन्नों के जाने के बाद। धन्नों का घर एक बार फिर गुलजार हो गया। धन्नों की अंतिम विदाई बच्चों ने अपने सामर्थ्य के अनुसार बड़े शान से किया। नये-पुराने के बीच की कड़ी टूट गई। 
धन्नों के एकाकीपन की एकमात्र सहयोगी कामिनी आज धन्नों के घर से दूर ही थी। उन्हें धन्नों के घर का चहलपहल रास नहीं आ रहा था। जब धन्नों को बेटा-बहू के समीपता और सहयोग की जरूरत थी, तब उनके आँसूओं को पोछने वाला कोई उसके पास नहीं था, पर आज सभी के सभी उनकी आत्मा के शांति या यूं कहे कि अपने भविष्य को सुरक्षित रखने के लिए एकत्र होकर धार्मिक अनुष्ठान को संपन्न कराने में जी जान व तल्लीनता से जुटे है।
कामिनी इस दिखावे से अपने आप को दूर ही रखीं। वे दूर सड़क पर से ही धन्नों को विदा होते हुए देखती रहीं, फिर वहीं से अपनी सच्ची श्रद्धांजलि देकर धन्नों के आत्मा के शांति की कामना करके अपने घर लौट आयी।  
 

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शंखनाद (कविता)