शादी की पार्टी में नहीं बुलाया (लघुकथा)

पड़ोस में रहने वाले पड़ोसी के बच्चे आपस में खेलते-कूदते,कुट्टी-कुट्टा करते हुए लड़ते-झगड़ते है। ऐसे में वे कभी एक होते, कभी छिटककर दूर हो जाते। उनका मिलना और बिछुड़ना एक आम प्रतिक्रिया है, जो निरंतर आपसी समझ से बनता और बिगड़ता रहता है। पर यदि इन्हीं बच्चों के बीच में यदि बड़े शामिल हो जाते है, तो बच्चों के आपसी समझ से सुचारु रुप से चलने वाली गाड़ी अपने पटरी से उतरकर डगमगा जाती है...जो बच्चों के हित में सही नहीं होता है।

एक मकान में दो परिवार उपर-नीचे किराएदार के रुप में रहते थे। नीचे के हिस्से वाले परिवार में एक बुजुर्ग दम्पति अपने बेटा-बहू और पाँच साल की पोती पूजा के साथ रहते थे। उपर की मंजिल में जो परिवार था...उसमें पति-पत्नी और उनके कालेज व यूनिवर्सिटी में पढ़ने वाले तीन बच्चे.. मालिनी, मुकुंद और मुनेंद्र थे।  
दोनों परिवारों में काफी एकता और समझ थी और मौके पर एक दूसरे की सहायता के लिए तैयार रहते थे। यही कारण था कि पूजा का अधिकांश समय उपर ही बीतता था। पूजा जो बहुत ही प्यारी बच्ची थी। वह सुबह ही उपर आ जाती थी। अपना सुबह का नाश्ता वह उपर ही करती थी। उसके साथ खेलने और मजे लगाने में मालिनी-मुकुंद और मुनेंद्र को बहुत मजा मिलता था। उनके इस मनोरंजन में मालिनी के मम्मी पापा भी अक्सर शामिल होते थे। बच्चे पूजा को खिलाते, खेलाते और तंग भी बहुत करते थे। जब मुकुंद पूजा को शैतानी में परेशान करने के लिए बेल्ट से बाँधकर खड़ा कर देता था तो पूजा चुपचाप खड़ी हो जाती या बँधे हाथों से ही छुपनछुपाई खेलती, पर चूं-चां नहीं करती थी जबकि मुकुंद की मम्मी आरती इसी बात पर डरती थी कि कहीं बच्चों के इस खेल में ही किसी बात पर उपर-नीचे दोनों परिवारों में चिल्ल-पों या कहासुनी न मच जायें।  कभी कभी पूजा को खेलाने में शैतानियाँ जब कुछ ज्यादा होने लगती थी, तो आरती को टोकना पड़ता था  पर पूजा के परिवार से कभी ऐसी नौबत नहीं आई जिसमें कोई अड़चन पैदा होने की उम्मीद जगे।
 
एकदिन पूजा अपने मम्मी-पापा के शादी के कई फोटोग्राफ्स लेकर उपर आयी और सभी को दिखाते हुए बहुत खुश नजर आ रही थी। फोटो देखकर सभी लोग मजा लेने लगे। मालिनी-मुकुंद व मुनेंद्र फोटो को देखकर मजा लगाने लगे। मालिनी पूजा से बोली," पूजा, तुम्हारे मम्मी-पापा की शादी हुई। चारों तरफ लोग खुशियाँ ही खुशियाँ मनाकर शादी का मजा लगा रहे है। कोई गा रहा है, कोई खा रहा है, कोई डांस कर रहा है।"
पूजा हँस-हँसकर बता रही थी ," हाँ दीदी, सब लोग बहुत खुश है। देखिये ये मेरी बुआ लोग है। ये चाचा है। ये बाबा-दादी तैयार हो कर कितने अच्छे लग रहे है।"
 
अचानक मालिनी को शैतानी सूझी। वह पूजा से बोली," पूजा, शादी में सभी लोग तो दिख रहे है, पर तुम कहीं नहीं दिख रही हो? क्या तुम्हारे मम्मी-पापा तुम्हें अपने शादी में बुलाये नहीं थे?"
पूजा चिंतित व हैरान होकर सभी फोटो में अपने को खोजने लगी। जब वह कहीं नहीं दिखी, तब वह रुआँसी होकर बोली," हाँ दीदी, आप सच बोल रही है। मम्मी पापा ने मुझे अपने शादी में बुलाया ही नहीं। मैं तो कहीं दिख ही नहीं रही हूँ।"
"हाँ-हाँ देखों, तुम किसी भी फोटो में हो नहीं? तुम्हारे मम्मी- पापा ने तुम्हें न बुलाकर बहुत गलत काम किया है।" मालिनी आग में घी डालते हुए बोली।
आग लगाकर जमालो दूर खड़ी वाली कहावत हो गई। पूजा झटपट सारे फोटो को सम्भालती हुई उठी और रोती हुई नीचे चली गयी।
नीचे जाकर पूजा रोती हुई अपनी माँ पूनम से बोली," मम्मी, आप ने अपनी शादी में सभी लोगों को बुलाया, पर मुझे क्यों नहीं बुलाया? देखिये सभी लोग मजा ले रहे है, पर मैं तो कहीं नजर ही नहीं आ रही हूँ।"
"तुम कैसे नजर आओगी? तुम तो तब थी ही नहीं। इसलिए तुम्हें कैसे बुलाते।" पूनम पूजा को समझाते हुए बोली।
पूजा आँसू बहाती ही रही। वह रो रोकर पूनम को बेहाल कर पूछती रही, बोली,"आपने बहुत बड़ी गलती की है, मम्मी। आप अपनी शादी में मुझे नहीं बुलायी, तो मैं भी अपने बर्थडे पार्टी में आपको नहीं बुलाऊंगी।" यह 
कहके पूजा फिर सुबकने लगी।
 
तब पूनम  हँसते हुए पूजा को गले लगाकर चुप कराते हुए बोली," बेटी, बात समझो, यदि तुम्हें शादी में बुलाती, तो मैं यहाँ कैसे आ पाती। तुम्हें बुलाने के लिए ही तो यहाँ आना पड़ा।"
उपर आँगन से पूनम और पूजा की बातें सुनाई पड़ रही थी। एक मजेदार घटना तू-तू, मैं-मैं में बदल सकती थी। पर समझदारी इसी को कहते है। यही कारण था कि दोनों परिवारों में जीवंतता अंत तक बनी रही। 
 
जहाँ समझदार लोग होते है, वहाँ छोटी-मोटी बातों का मजा लेकर जीवन को जीवंतता से जीते है..तू-तू, मैं-मैं नहीं करते। यही अच्छे, समझदार और सुलझे लोगों की निशानी है। जीवन को छोटे-मोटे उलझनों में उलझाकर बेजान व बेरौनक करना अपने ही पैर में कुल्हाड़ी मारने जैसा होता है, वरना बच्चों के नाम पर बड़े बवाल होते देर नहीं लगती है।

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