लाठीचार्ज (लघुकथा)

श्रीधर बैंक में मैनेजर थे। कोरोनाकाल में भी बैंक खुला होने के कारण उन्हें प्रतिदिन बैंक जाना पड़ता था। कोरोना वायरस का खौफ सबके मन में समाया था। श्रीधर अपने बेटा मुकुंद को कोरोना वायरस के बारे में अच्छी तरह समझाते रहते थे, ताकि बैंक से आते ही वह उनके गोद में उठाने के लिए जिद न करे। पाँच साल का मुकुंद समझदार  था। वह अपने पापा की बाते ध्यान से सुनता और अमल करता। बैंक से आने बाद श्रीधर जब तक नहाते-धोते तब तक मुकुंद वहीं आसपास चुपचाप मंडराता रहता, ताकि पापा जल्दी से इन झंझटों से मुक्त हो और वह उनकी गोद में समा सकें। इस बीच श्रीधर भी कोई ना कोई बात छेड़कर बेटा को बहलाते रहते थे। श्रीधर की पत्नी मंजुला दोनों की बातों को सुनने का मजा लेती और बीच-बीच में टिपकारी करती रहती।
 
श्रीधर के बैंक में एक कर्मचारी कोरोना पाजिटिव पाया गया तो बैंक को सील कर दिया गया। बैंक से लौटते समय श्रीधर को रास्ते में भीड़ का सामना करना पड़ा। लॉकडाउन में हो रही परेशानियों से छुटकारा पाने के लिए, लोगों ने सड़क पर भीड़ लगा रखा था। पुलिस भीड़ को नियंत्रित कर रही थी। जब पुलिस भीड़ को नियंत्रित नहीं कर पायी, तब उसने लाठीचार्ज कर दिया। लाठीचार्ज के कारण अफरातफरी मच गयी। जिसको जिधर से रास्ता मिला, उधर से ही भागने लगा। श्रीधर भी अपने को बचाते हुए किसी तरह घर पहुँचे।
 
अचानक श्रीधर को देखकर मंजुला और मुकुंद दोनों घबड़ा गये। श्रीधर बोले, "आज बैंक में एक कर्मचारी कोरोना पाजिटिव पाया गया, अतः बैंक को सैनेटाइज करने के लिए बैंक को बंद कर दिया गया। पर रास्ते में लॉकडाउन से उबे लोग सड़कों पर उतर आये है, जैसे उन्हें कोरोना का कोई भय ही नहीं था।"
 
"भीड़ में आना तो बहुत मुश्किल था। फिर आप कैसे आये?" मंजुला घबड़ाकर बोली।
"भीड़ पर पुलिस ने लाठीचार्ज कर दिया था। तितरबितर होती भीड़ से किसी तरह बचते बचाते आया हूँ।"
"ठीक है, आप फ्रेश होकर आइए। मैं चाय बनाती हूँ।"
 
तभी चुपचाप खड़ा मुकुंद तपाक से बोला, "पापा, एक बात बताईये; पुलिस के लाठी के पास कोई चार्जर वाला छेद और चार्जर तो होता नहीं है, फिर पुलिस अपने लाठी को चार्ज कैसे करता होगा?"
 
मुकुंद के इस अटपटे, पर सटीक और सही लगने वाले प्रश्न पर श्रीधर चौंककर बोले,"रुक नटखट, तुझे अभी बताता हूँ कि पुलिस की लाठी कैसे चार्ज होता है?" यह कहकर श्रीधर लपककर मुकुंद को पकड़कर गोद में उठा लिए और उसे चूमते हुए बोले," देखो, पुलिस की लाठी ऐसे चार्ज होती है।" यह कहकर वे दनादन मुकुंद को चूमने लगे।
तभी रसोई घर से मंजुला चिल्लाकर बोली, "अरे,रे,रे, ये क्या कर रहे हैं? बिना नहाये-धोये ही मुकुंद को गोद में उठा लिए।"
श्रीधर अचकचा कर बोले," ओह, मैं तो भूल ही गया था। इस लाठीचार्ज ने कोरोनाकाल के सारे डर को छूमंतर कर दिया। बेटा, अब तुम भी नहाने आ जाओ। हम दोनों नहा लेंगें, तब मैं और अच्छी तरह पुलिस की लाठी चार्ज कैसे होता है, तुम्हें समझाता हूँ। "
श्रीधर को अपनी गलती का एहसास हुआ तो वे जल्दी से नहाने चले गये। वे और मुकुंद नहाकर लौटे तो श्रीधर मुकुंद को गोद में लेकर बोले,"अब तुम्हें समझाऊँ लाठीचार्ज कैसे होता है? पुलिस की लाठी चार्जर से नहीं, बल्कि पुलिस वालों के क्रोध के कारण चार्ज हो जाती है, तभी तो वे जब चोर-उचक्कों और बदमाशों को देखते है तो क्रोध में आ जाते है, तब उनकी लाठी बरसने लगती है।"
गमगीन वातावरण कुछ पल के लिए ठहर गया। बच्चे तो बच्चे ही होते है। एक बच्चे के तर्को वाले सटीक प्रश्न ने कुछ समय के लिए घर के माहौल को कोरोना मुक्त कर खुशहाल बना दिया। तीनों मिलकर हँसते-खिलखिलाते माहौल में चाय पीने लगे।
 

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