कंकड़ फेंकना ठीक नहीं (लेख)

कुछ लोगों की मंशा दूसरों की जिंदगी में कंकड़ फेंककर सिर्फ हलचल मचाना ही होता है। ऐसे लोगों को ढ़ूढ़नें के लिए आपको कहीं जाने की जरुरत नहीं है। ये कहीं ना कहीं आपके अपने ही आसपास मिल जायेंगे। बस यदि कुछ जरुरी है, तो यह जरूरी है कि आप उन्हें पहचानते है कि नहीं? और यदि नहीं पहचानते है, तो पहचानेंगें कैसे?
वैसे ऐसे लोगों को पहचानने की भी जरूरत नहीं होती है क्योंकि ये अपनी हरकतों से खुद व खुद सामने आकर दिखने लगते है और अपनी पहचान उजागर कर देते है।
 
जिंदगी में संपर्क में आये वे व्यक्ति जो आपको चैन से अपना काम करने ना दे, अपने उलजुलूल बातों में आपको हरदम फँसाये या उलझाये रखने की कोशिश करता रहे और अपने उलटी-सीधी हरकतों से आपका ध्यान आकर्षित करके आपको भटकाता रहे...वहीं लोग ऐसे लोगों की श्रेणी में आते है। ऐसे व्यक्ति का उद्देश्य सिर्फ इतना होता है कि वह आपके अपने दैनिक कार्यों और उचित सोच में कंकड़ मारकर भटकाव उत्पन्न कर दें, जिससे आप अपने मूल उद्देश्य से भटककर गलत दिशा में मुड़कर भटक जाए।
 
ऐसे व्यक्तियों की श्रेणी में अधिकतर वहीं लोग आते है जिन्हें आपकी उन्नति से चिढ़न होती है। आपकी सफलता उनको रास नहीं आती है। जिंदगी के दौड़ में जो आपसे पीछे रहने के कारण खुन्नस खाये रहते है। उन्हें ही आपको आगे जाने से रोकना होता है, उन्हीं के दिमाग में ऐसी तिकड़मी सोच और उटपटांग हरकतें बनती और पनपती है। जिसके कारण पहले वही स्वयं अपने दिमाग को भटकाते है, फिर आपको भटकाने के प्रयास में जुगत लगाकर जुट जाते है।

ऐसे लोग सोचते है कि ऐसा करके वे बहुत फायदें में है, तो यह उनकी बहुत बड़ी भूल होती है। क्योंकि ऐसे लोग कभी सुख-चैन से बैठ नहीं पाते है। उनका दिमाग खुराफाती बातों में भटकता रहता है, वे तरह-तरह के मंसूबों को बनाने में अपने अच्छे-खासे दिमाग का बंटाधार कर देते है। फिर ऐसे लोगों की उन्नति होगी भी तो कैसे होगी? क्योंकि खुराफाती दिमाग के कारण उनका स्वयं पर से भरोसा फिसलती हुई गर्त में जाकर समाप्त हो जाता है, फिर वे अपनी उन्नति के लिए भी कोई प्रयास दिल से कर नहीं पाते है और दिल से प्रयास न करने के कारण उन्हें सफलता भी नहीं मिलती। दूसरों की जिंदगी में तंगड़ी लगाने वाले, तो खुद अपने बनाये तंगड़ी में फँसकर गिर जाते है, फिर वे सोचकर भी दूसरों को गिरा नहीं पाते क्योंकि दूसरा इन उलझनों से दूर स्वयं के प्रयास में निरंतर जुटा रहता है और सफलता प्राप्त कर लेता है।
इसलिए जो स्वयं के उन्नति के लिए उत्सुक होगा, वह ऐसे खुराफाती हरकतों में उलझेगा ही नहीं। जैसे-कुत्ता भौंक-भौंक कर हाथी को भटकाना या परेशान करना चाहता है, पर हाथी इन सबसे अनजान अपने चाल में मस्त हो कर आगे बढ़ता चला जाता है। 
 
इसलिए समझदारी यही है कि स्वयं अपनी उन्नति का राह बनाओं और आगे बढ़ों। दूसरे का किला ढ़हाने से स्वयं के शक्ति का ह्रास होगा और मंजिल सामने रहते हुए भी दिखेगी नहीं। और जो दिखेगा ही नहीं.. उस तक पहुँचने का सारा प्रयास विफल हो जायेगा। 
 
इसलिए कंकड़ फेकना छोड़कर...स्वयं के प्रयत्न एवं प्रयास से आगे बढ़ों , उन्नति का राह बनाओ और दूसरों को भी आगे जाने का मौका दो...यही सफलता पाने और आगे बढ़ने का मूल मंत्र है।
 

No comments:

शंखनाद (कविता)