माँ का थप्पड़ (बाल कविता)

एक बार माँ के हाँथों का थप्पड़,
जोरदार पड़ा था, बचपन में मेरे,
स्मृति पटल में अंकित है,अब भी,
कभी भूलता नहीं है, मन से मेरे। 

दिल पर चोट लगी थी, गहरी,
हो गये थे लाल, गुलाबी गाल,
नहीं बोलूंगा माँ से, सोच लिया,
कभी पास भी नहीं फटकूंगा,मैं।

आँखें आँसुओं से लबालब थी, 
दिल बेचैन हो, सुबक रहा था,
बहुत कठीन था, दर्द ये झेलना,
रुठा रहूंगा हरदम मैं, माँ से।

यह सोचकर, विकल हुआ मन,
मैं औंधे मुँह सिसकता सो गया,
अचानक नींद में खलल पड़ी, 
माँ सहला रही थी, गालों को मेरे।

महसूस हुआ, खुलने लगी आँखें,
पर उसे मूंदें मूंदें, यूं ही पड़ा रहा,
सुखद अनुभूति का अनुभव पाया,
प्रेमभाव में लीन हो गया मैं, माँ के।

वो थप्पड़ जो पड़ा था, पहले,
परेशान कर रहा था, घावों सा।
हो गया छूमंतर, क्षण भर में ही,
भूल गया वह जिद,जो ठानी थी,

माँ ने जो खोल दी, आँखें मेरी,
बदल दी उसी ने कायनात मेरी। 
मैं करवट बदलकर, चुपके से,
छुप गया, आँचल के छाँव तले।

थप्पड़ पड़ा था, माँ के हाथों का,
वह भी प्यारा लगा, समझाने में, 
सीखाने की कला में माहिर है, माँ,
उलझे पहलू को, सुलझाती भी है,

जिंदगी के हर गम, हर दुख को, 
समेट लेती है,थप्पड़ या प्यार से
जिंदगी को जगमग-जगमग कर,
सितारों सा सुंदर सजा देती है, माँ।
 

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