भूत का डर - बच गई मैं (संस्मरण)

भूतों के बारे में अक्सर चर्चा सुना भी है, कहानियों में पढ़ा भी है और पिक्चरों में देखा भी है, पर भूत होते भी है या नहीं? यह सच्चाई मैं भी नहीं जानती। ये मायावी जीव क्या सचमुच होते भी है या ये सिर्फ कोरी कल्पनाओं की कोर कल्पित घटना मात्र होते है। यह उलझाने वाला प्रसंग है।

पर स्वयं जब एक घटना से मेरा पाला पड़ा और अनुभव मिला, तब मैं दुबिधा में पड़ गई। इस घटना को जब भी याद करती हूँ..यह मुझे झंकझोरता है और कुछ सोचने पर विवश करता है कि मैं सोचू, फिर अपने सोच का सही आंकलन करु कि वास्तविकता क्या हो सकता है...ये भूत होते भी है या नहीं? मैं तो समझ नहीं पायी, इसलिए आज मैं अपनी संस्मरण लेखनीबद्ध कर रही हूँ, ताकि दूसरे भी समझ संके कि इस बात के असलियत में कितना दम है और यह कितना सही है।
 
रागिनी दीदी को पापा ने बी.ए. करने के लिए लड़कियों के एक कालेज में नाम लिखवा दिया। दीदी हॉस्टल में रहने लगी। पापा तहसीलदार थे, अतः हम जिस तहसील में रहते थे, वहाँ उच्च शिक्षा का अभाव था। दूसरे साल मैं इण्टर में पहुँच गई। मेरा सब्जेक्ट सांइस था। अतः पापा मेरा भी नाम उसी कालेज में लिखवा दिए, जहाँ दीदी पहले से पढ़ रही थी। मेरा क्लास शुरू हो गया, अतः पापा मुझे पहले ही हॉस्टल पहुँचा दिए।
हॉस्टल का पहला दिन...रैगिंग के कारण वैसे ही मन सहमा हुआ था। रात हुई तो बरामदे में ही बिस्तर लग गया। मेरे कमरे में मुझे लेकर चार लड़कियाँ थी। मैं अपनी एक रुममेट के साथ सो गई। रात में अचानक मेरी नींद इस एहसास से खुल गई कि कोई मेरे तकिया के नीचे हाथ डाल रहा है, कभी लगता पैरों की तरफ से कोई हिला रहा है। मैं डर गई। पर इस डर में भी मैं अपने हिम्मत को बाँधे रही। डर और हिम्मत मन ही मन में जूझ रहे थे। बगल में लेटी रुम मेट ममता को भी जगा नहीं पायी। ईश्वर में आस्था के कारण अंदर ही दम साधे भगवान का स्मंरण करती या हनुमान चालीसा पढ़ती रही। 
 
जब बाथरूम में लड़कियों का आना-जाना शुरू हुआ, तब मैं आश्वस्त होकर चादर से बाहर अपना मुँह निकाल ली। इस बात की चर्चा मैं किसी से कर नहीं पाई।
पर शाम होते ही, जैसे-जैसे अंधेरा घिरने लगा, मेरी रुहें कांपने लगी। एक अनजाना भय मन में समाने लगा... किससे कँहू, क्या कँहू? कोई समझ भी पायेगा या नहीं। या मैं सिर्फ हँसी की पात्र न बन जांऊ और तब मेरी समस्या का कोई समाधान भी मिल पायेगा या नहीं। अजीब सा असमंजस का उथल-पुथल मन में कुड़बुड़ा रहा था।
रात का प्रार्थना होने जा रहा था। सुबह ही मैंनें रागिनी दीदी का एक पत्र उनकी एक सहेली मीरा दीदी से मिलकर उनको दे चुकी थी। वे पत्र पढ़कर उसी समय बोली थी," कोई परेशानी होगी, तो निसंकोच मुझसे आकर कहना।"
मेरे इस घबड़ाहट वाले पल में मुझे मीरा दीदी एकमात्र सहारा पाने के विकल्प के रुप में ईश्वर का रुप लगी।
प्रार्थना समाप्त होने पर मैं उनके पास गई। वे मुझे देखते मेरे पास आ गई, बोली,"क्या बात है?" 
मैं दीदी को पकड़कर फफककर रोने लगी और बोली, "दीदी, मैं अपने कमरे में नहीं सोऊंगी। मुझे वहाँ डर लग रहा है।"
दीदी कुछ पूछी नहीं, बस सांत्वना देती हुई बोली,"ठीक है। डरो मत। बस मेरे कमरे में आ जाओ। वहीं सोना।"
मैं आश्वस्त हो कमरे में गई और जरूरी किताब-कापी लेकर दीदी के कमरे में आ गई और वहीं सो गई। जब तक रागिनी दीदी नहीं आई, मैं मीरा दीदी के कमरे में उनके पास ही सोती रही। रागिनी दीदी के आने के बाद मैं सामान सहित उनके कमरे में आ गयी। यद्यपि यह हॉस्टल के नियम के विरुद्ध था, फिर भी मेरा पूरा साल रागिनी दीदी के कमरे में ही कटा। मुझे सुकून मिल गया। अपने हॉस्टल के अपने कमरे में मेरी दूसरी रात कभी हुई ही नहीं। पर कभी-कभी यह सोचकर डर जाती हूँ कि यदि रागिनी दीदी नहीं होती तो, मेरा क्या होता?
 
ये संस्मरण एक अनबूझ पहेली की तरह अभी पूरा नहीं हुआ है। इसकी आधी कहानी तो अभी बाकी ही है।
समय बीतते गया। मैं भी वहाँ रमने लगी। वहाँ के किस्सों में एक किस्सा यह भी सुनने को मिला कि यहाँ हर साल एक लड़की भूत के चपेट में फँसती है। मुझे घोर आश्चर्य उस दिन हुआ जिस दिन मुझे पता चला कि भूत मेरी उसी रुममेट ममता को पकड़े था, जो हॉस्टल के पहली रात मेरे बगल में मेरी खाट पर सोई थी। वार्डन जब हॉस्टल में ममता को देखने आयी तो मैं भी वहाँ उपस्थित थी, क्योंकि वह रुम मेरा भी था। वार्डन हनुमान चालीसा पढ़ी, फिर हम लोगों से भी ममता के पास बैठकर पढ़ने को बोली। करीब दस-पंद्रह दिन ममता की तबीयत खराब थी। थोड़ी भी चेतना आती या उसे छूट मिलता, वह दौड़ती हुई हॉस्टल-कालेज एक कर देती। उसके बाद उसे पकड़ना कठिन हो जाता था, जिसके कारण हॉस्टल के चपरासी या रसोइयाँ की मदद लेनी पड़ती थी। 
 
अब मैंने अपना ध्यान उधर से हटा लिया। मेरा दिन दीदी के कमरे की वजह से आराम से कट रहा था। लेकिन जब भी उस घटना को याद करती हूँ...रोंगटे खड़े हो जाते है। फिर मैं ईश्वर को धन्यवाद देती हूँ कि उनकी भक्ति के कारण मैं उस दिन तो बच गई...वरना मेरा न जाने क्या हाल होता?  यह घटना आज भी अनसुलझे पहेली की तरह मन में गडा हुआ है, इसलिए याद जरूर आता है।
 

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