हमें हमार रुपैया तव लौटाई देव (लघुकथा)

बच्चे तो बच्चे होते है, इच्छाओं,भावनाओं और लालसाओं पर बच्चों का भी बस नहीं होता। अपने सोच के अनुसार वे भी सपने देखते है...आगे बढ़ने या पढ़ने के लिए।
ऐसे ही एक गरीब शैतान बच्चे से अनुप्रिया जब मिली, तब उसकी सोच ही बदल गयी।
 
अनुप्रिया कालेज में अध्यापिका थी। पति के ट्रांसफर के कारण उसने पढ़ाना छोड़ दिया। नई जगह, पर अब किसी स्कूल में नौकरी करने की उनकी इच्छा नहीं हुई, तो वे घर पर ही रहने लगी। थोड़े दिनों बाद जब खाली समय में मन उबने लगा, तब उनसे रहा नहीं गया।  उसी समय पता चला कि पास के एक अनाथालय में खुले गरीब बच्चों के स्कूल में कोई टीचर नहीं है, तब अनुप्रिया मात्र दो घंटा के लिए वहाँ जाने लगी। 
 
आसपास के झोपड़ियों में रहने वाले गरीब बच्चों की टोली बड़े उत्साह से वहाँ पढ़ने के लिए आती थी। बरामदें में दो क्लास लगती। वह और अनाथालय की एक लड़की मिलकर दोनों क्लास के बच्चों को पढ़ाती थी। अनुप्रिया का मन इन छोटे बच्चों में काफी रम गया। वे उनकी शैतानियों, चुहुलबाजियों के  बीच उनके पढ़ने की जीजिविषा से काफी प्रभावित हुई, अतः वे मन से पढ़ाने लगी।
 
अनुप्रिया के क्लास में अभय नाम का एक लड़का था। उसकी शैतानी तो ठीक थी, पर जब वह पूरे कक्षा में व्यवधान उत्पन्न करता, तब अनुप्रिया खिज जाती। तंग आकर अनुप्रिया ने एकदिन उसे कक्षा से बाहर कर दिया। वह ब्लैकबोर्ड के पीछे ढ़ीठ बच्चे की तरह खड़ा होकर खुंसाते हुए बुदबुदाने लगा। अनुप्रिया जितना डाटती, वह उतना ही ज्यादा बड़बड़ाते हुए अनुप्रिया को परेशान करने लगा। अनुप्रिया सोच ली थी कि आज इसे कक्षा में नहीं बुलाऊंगी। शायद अभय को भी आभास हो गया कि मैम उसे अंदर नहीं बुलायेंगी, तब वह ठसकते हुए बोला," हमें कक्षा में बुलावे और पढ़ावे को नाहीं है, तो हमार दस रुपैया तो लौटाई दो। हम चले जईवे।"
रुपया? अनुप्रिया चौंक गयी। बाद में अनुप्रिया को पता चला कि इन गरीब बच्चों से यहाँ भी फीस लिया जाता था।
कुछ महीनों बाद संचालिका से तालमेल न बैठने के कारण अनुप्रिया वहाँ जाना छोड़ दी। बाद में स्कूल भी बंद हो गया।
 
कालोनी के आसपास के ही बच्चे पढ़ते थे, अतः वे अक्सर  बच्चे मिल ही जाते थे। मिलने पर वे आदर भाव ही दिखाते।अभय जब मिलता, तब उसके चेहरे पर मासूमियत के साथ दृढ़ता भी झलकती थी। वह अनुप्रिया से एक ही प्रश्न पूछता और कहता," मैम, स्कूल काहें बंद होई गवा? हमें आगे पढ़ै के बा। अब हम शैतानी कबहूँ नाहीं करब।"
अभय की लालसा अनुप्रिया को झकझोर देती । इस प्रश्न के उत्तर की तलाश में एकदिन अनुप्रिया ने अभय से कहा," मेरे घर आ जाओ, मैं तुम सबको पढ़ाऊंगी।"
 
इस प्रकार अनुप्रिया के घर में छोटे से स्कूल की नींव पड़ गई।
 

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