साथी ने साथ निभाया (संस्मरण)

शादी दो अनजान लोगों का अटूट बंधन होता है, जिसमें जुड़े दोनों लोगों की विभिन्नताएं जग जाहिर है, क्योंकि उनका परिवार, रहन-सहन, विचार और संस्कार भिन्न-भिन्न होता है। आपसी समझबूझ व समझौते से समानता बैठानी पड़ती  है, तभी जीवन सफल और सुंदर बनता है, वरना नरक होती जिंदगी को कोई बचा नहीं सकता है।

शादी के बाद हम पति-पत्नी भी वैचारिक विभिन्नता से पूर्ण थे।  हमारे वैचारिक मतभेद अक्सर सड़क पर ही उजागर हो जाते थे। सड़क पार करते समय तो अक्सर किच-किच हो जाती थी। ये सड़क पार करने के लिए आगे बढ़ते, तो मैं डरकर पीछे हो जाती थी। कभी मैं आगे बढ़ती तो ये पीछे छूट जाते। तालमेल के अभाव में ये सड़क पर ही मुझे डांटते और कहते," तुम कभी ना कभी एक्सीडेंट जरुर करवा दोगी।" इस बात पर हमारी लड़ाई भी अक्सर हो जाया करती थी। बार-बार टोकने के बाद भी हम सड़क पर एक साथ नहीं चल पाये। ये तेज रफ्तार में चलते और मैं खिसियाती, बुदबुदाती हुई इन्हें पकड़ने की कोशिश में अपनी चाल तेज करते हुए हर प्रयास करती, फिर भी पीछे ही रह जाती।
हमारे बीच काफी असमानतायें थी। फिर भी, इन भिन्नताओं के बावजूद साथ रहते हुए... जिंदगी के अहम् मुद्दों पर, कभी बच्चों के मुद्दों पर, तो कभी परिवार की समस्याओं पर...बात करते-करते हम कब एक होते गये, हमें स्वयं ही पता नहीं चला। धीरे-धीरे हम एक दूसरे को समझने लगे थे।
अब कभी ये मेरी बात सुनने लगे, तो कभी मैं इनके फैसले पर अपनी मुहर लगाने लगी। एकरसता व एकरूपता का भाव धीरे-धीरे हमारे मन में पनपकर हमारे दिलों को जोड़कर एक दूसरे का पूरक बना दिया। अब हम नोंकझोंक के बावजूद भी एक दूसरे का ध्यान रखते, भावनाओं की कद्र करते और एक दूसरे के सुख-दुख को अपना समझकर सहयोग करते।
अब हम सड़क पार करते समय कभी भी एक दूसरे का हाथ पकड़ना नहीं भूलते। कभी ये रुककर मेरा हाथ पकड़ते, तो कभी मैं आगे बढ़कर इनका हाथ पकड़ती। अब हम साथ-साथ मिलकर सड़क को पार करते और मंजिल तक साथ ही पहुँचते क्योंकि हमनें साथ जीने की कला सीख ली है।

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शंखनाद (कविता)