दादी की लाडली (लघुकथा)

कोरोनाकाल में जिस तरह लॉकडाउन किया गया और कोरोना वायरस का डर लोगों के मन में व्याप्त हुआ, उसका असर बच्चों पर भी पड़ा। जो लोग कभी एक दूसरे के बहुत करीब थे... वही आपस में दूरी बनाने और एक दूसरे से कटने लगे।
सपना यानि अपनी दादी की लाडली सुग्गी ...अपनी दादी के साथ ही रहती थी। वह अपने दादी को बहुत प्यार करती थी। दादी किसी दुखद घटना में अपने भाई के घर गई थी और वहीं लाॅकडाउन के कारण फँस गई और घर वापस नहीं आ पायी। 
आज सुग्गी की दादी ढ़ाई माह बाद घर आ रही थी। सुग्गी की मम्मी राखी, अपनी बेटी सुग्गी से बोली," सुग्गी, आज तुम्हारी दादी घर आ रही है। तुम बार-बार पूछती थी कि दादी कब आयेंगी? अब आ रही है, तो अब तो तुम खुश हो ना।"
" सच मम्मी, दादी आज आ रही है, मैं बहुत खुश हूँ। अब तो बहुत मजा आयेगा। मुझे दादी के बिना बिलकुल अच्छा नहीं लगता था। वे कब तक यहाँ आ जायेंगी? मैं उनसे मिलने को उतावली हूँ।" सुग्गी चहकती हुई बोली।
" वे टैक्सी से आ रही है। सात-आठ बजे तक यहाँ पहुँच जायेंगी।" राखी बोली।
"ठीक है मम्मी, मैं तब तक बाहर अपनी दोस्तों के साथ खेलकर और उन्हें बता कर आती हूँ कि दादी आज आ रही है।" यह कहकर सुग्गी खेलने चली गई।
राखी का घर एक सोसायटी में था, जहाँ सीमित परिवार और बाहरी लोगों का हस्तक्षेप न होने के कारण लॉकडाउन के समय में भी बच्चे आपस में खेल लेते थे। सुग्गी के जाने के बाद राखी अपने काम में जुट गई।
थोड़े समय बाद राखी ने किचन की खिड़की से देखा कि सुग्गी अपने कमरे में गयी और उपर रखी अपनी दोनों बड़ी वाली गुड़िया लेकर नीचे आ रही है। राखी वहीं से चिल्लाकर बोली," सुग्गी, अपनी गुड़िया लेकर यहाँ क्यों आ रही हो?"
"मम्मी, दादी आ रही है ना, इसलिए।" सुग्गी बोली।
"दादी आ रही है, तो क्या हुआ? तुम गुड़िया ले कर जाओ और वहीं रखो, जहाँ वह रहती है, वरना खेलते समय खोजोगी।" राखी आश्चर्यचकित होकर बोली।
सुग्गी माँ की बातों को अनसुनी करके चलती हुई नीचे आ गई। 
राखी किचन से बाहर आयी और गुड़िया खींचते हुए बोली," गुड़िया यहाँ नहीं रहेगी। वहीं उपर ले जाकर रखो।"
राखी की बात सुनकर सुग्गी रुआँसी होकर बोली," मम्मी, दादी आ रही है। पीहू बता रही थी कि तुम्हारी दादी बाहर से आ रही है। बाहर से आने वाले लोगों को कहीं कोरोना ना हो, इसलिए वे कुछ दिनों के लिए कोरेंटाइन रहते है। कोरेंटाइन रहने वाले लोग अकेले अलग कमरे में रहते है। उनको कोई छूता नहीं है और न कोई उनके पास जाता है। हमारे यहाँ तो उपर का कमरा ही अकेला है, जहाँ कोई जाता नहीं है, सिर्फ हम लोग खेलते है। दादी से यदि मेरी गुड़िया को कोरोना हो गया तो मैं क्या करुंगी? इसी डर के कारण मैं अपनी गुडिया वहाँ से लेती आयी हूँ ताकि उसे खतरे से बचा संकू।"
सुग्गी की ऐसी गूढ़ बातें सुनकर राखी सकते में आ गयी। वह गुड़िया छोड़ दी, तो सुग्गी अपनी गुड़िया लेकर दौड़ती हुई अपने कमरे में चली गई।
दादी के आने पर सुग्गी मास्क लगाकर दूर से ही चरण स्पर्श करके पूछी," दादी,आपकी यात्रा कैसी थी?" 
दादी बोली," ठीक थी, आराम से आ गई हूँ। तुम कैसी हो?" इतना सुनते ही सुग्गी बोली," मैं ठीक हूँ दादी। मैं आपसे तब बातें करुंगी, जब आपका कोरेंटाइन समय समाप्त हो जायेगा तब मैं आपके पास आऊंगी।" सुग्गी ये कहकर अपने कमरे में चली गई। 
राखी सोचने लगी कि दिनभर दादी से चिपककर रहने वाली सुग्गी भी इस कोरोना काल में कितनी सतर्क व जागरूक या यूं कहे कि माहौल के नाजुकता में डरी व सहमी ंंहुई है कि उसे अपनी दादी से ही डर लग रहा है।
थोड़ी देर बाद राखी सुग्गी को अपने पास बुलायी, फिर वे सुग्गी को समझाते हुए बोली," बेटी, दादी से थोड़ी दूरी बनाना सिर्फ इसलिए जरूरी है, क्योंकि दादी सफर करके आ रही है। सफर का कोई असर न हो, इसलिए थोड़ी सावधानी रखेंगे, पर इसका मतलब यह नहीं हुआ कि तुम इतने दिनों बाद आयी दादी से बात भी नहीं करोगी। दादी ने अपने को सेनेटाइज कर लिया है। तुम इस सोफे पर बैठकर बातें करो, तुम्हें कुछ नहीं होगा। सोशल डिस्टेंडिंग दूसरे बाहरी लोगो से रखना है ,अपनों से नहीं। तब तक मैं नाश्ता लेकर आती हूँ।" 
राखी के समझाने पर सुग्गी वहीं बैठकर दादी को देखने और मुस्कुराने लगी तो दादी को भी खुशी और सुकून मिला कि कुछ दिनों की परेशानी और दूरी है, वह धीरे-धीरे समाप्त हो जायेगा।
नाश्ता आने पर सुग्गी अपने हाथों से तश्तरी आगे बढ़ाई तो राखी समझ गई कि सुग्गी का डर कुछ कम हो गया है। वे सोचने लगी कि आजकल के बच्चों को कुछ बताने की जरूरत नहीं पड़ती, उन्हें माहौल और साथीगण सब कुछ गूढ़ता से समझा देते है।
काफी दिनों से अधुरा लगने वाला परिवार अब दादी के आने से भरापूरा लगने लगा। हँसी-खुशी के माहौल से परिवार एक नये उमंग में डूब गया।
 

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