नार्थपोल साउथपोल (संस्मरण)

मैं अपने पोता सिद्दिद के लिए ग्लोब खरीद कर ले आयी, ताकि उसे देश-विदेश के भोगौलिक स्थित की जानकारी मिल सकें।
सिद्दिद ग्लोब में रुचि भी लेने लगा। उसे विभिन्न देशों के नाम की जानकारी मिलने लगी। वह उन देशों में से कभी किसी का, तो कभी दूसरे का नाम लेकर प्रश्न पूछने लगा। मुझे खुशी हुई। सिद्दिद का मोबाइल की जगह ग्लोब में रुचि लेना, हमें रुचिकर लगा।
 
एकदिन हम आराम की स्थिति में लेटे थे। उसी समय सिद्दिद अचानक मेरे पास आकर बोला," दादी, आपने  मुझे नार्थपोल कभी घुमाया क्यों नहीं? क्या आप मुझे अभी के अभी नार्थपोल घुमा देंगी? मैंने नार्थपोल अभी तक देखा भी नहीं है।"
मैं उसके इस अप्रत्याशित व अनोखे प्रश्न पर अचकचा कर उसे देखने लगी। फिर उसके घुमक्कड़ी व जिज्ञासु प्रवृत्ति को शांत करने के लिए बोली," बेटा, नार्थपोल यहाँ से बहुत दूर है। वहाँ बर्फ की मोटी पर्त जमा रहती है, जिससे ठंड़ भी बहुत पड़ती है। वहाँ छः महीना दिन, तो छः महीना रात होती है। इसलिए इतने ठंड़े प्रदेश में हम वहाँ घुमने नहीं जा सकते है।"
मेरे उत्तर से मुझे लगा कि उसकी जिज्ञासा शांत हो गई है। पर नहीं, वह तो मेरे और अधिक करीब आकर भोलेपन से बोला," ठीक है। हम आपकी बात मानकर नार्थपोल नहीं जाते है, लेकिन तब क्या आप मुझे साउथपोल अभी के अभी घुमा देंगी? हम साउथपोल भी कभी नहीं घुमें है?"
 
मैं सोच में पड़ गई कि अब इस भोले सिद्दिद को कैसे और क्या जवाब दूं?
तभी पास बैठे पति के हँसी की फौव्वारों से हम दादी-पोता चौंक गये। वह बोले ,"और ज्ञान बढ़ाओं पोते का। अब इसे ले जाओ, अभी के अभी घुमाने के लिए... कभी नार्थपोल तो कभी साउथपोल।"
 
हम कुछ कहते, उससे पहले ही सिद्दिद मेरी गोद में समा चुका था। मैं उसके बालों को सहलाते हुए उसके प्रश्न का जवाब सोचने लगी।

1 comment:

Shalini Raman said...

Behad pyara lekh..

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