रसोईघर का सुख (लघुकथा)

दीविशा की रसोईघर हरपल गुलजार रहती थी। बड़े लगन और शौक से बनाये गये भोजन को सभी लोग दिल खोलकर एकसाथ बैठकर खाते थे। डाईनिंग टेबुल नहीं था। पर ड्राइंग रूम में फर्श ही डाईनिंग टेबल बन जाता था। जहाँ कूकर और डोंगे सज जाते थे। मिलजुल कर खाना निकलता और सोफा पर एक साथ बैठकर भोजन का रस लिया जाता था। खाना बनाने की जिम्मेदारी तो दीविशा की होती थी, पर आग्रह और प्रेम से खिलाने के कर्तव्य का निर्वहन दीविशा के पति अमरेंद्र जी करते थे। मिलजुल कर खाने और खिलाने की जो विशेषता और संतुष्टि दीविशा-अमरेंद्र में दिखता था...वही उनकी पूंजी थी। अपने-पराये का भेदभाव यहाँ नजर नहीं आता था... तभी तो दीविशा के मायके और ससुराल वाले निसंकोच दीविशा के घर आते और ठहरते थे। राजधानी होने के कारण लोगों की जरुरतें उन्हें यहाँ खींच लाती थी। ठहरने का आश्रय मिलना और आने वाले के सुविधा का ध्यान रखनें के कारण लोग निसंकोच दीविशा के घर आते थे। रसोईघर की यही धरोहर दीविशा-अमरेंद्र को खुशी देती थी। 
दीविशा शादी से पूर्व ऐसी नहीं थी। रसोईघर में चूल्हे पर कुछ पकाना तो दूर उसके पास फटकने में भी दीविशा को अपनी नानी याद आती थी। चूल्हें पर वह कैसे और क्या पका पायेगी जो लोगों को संतुष्ट कर सकें? इस डर से  उसकी आत्मा कांपती थी, क्योंकि पढ़ना ही उसके जीवन का उद्देश्य था और इसी उद्देश्य की पूर्ति में उसने कभी गृहस्थी के कामों में रुचि नहीं दिखाई थी। परीक्षा समाप्त होने के अट्ठारह दिन बाद ही वह विवाह के बंधनों में बँध गई और ससुराल आ गई।
पर सीख की यही एक प्रवृत्ति ऐसी थी जो दीविशा ने अपने ससुराल में सीखा और आत्मसात किया। ससुराल में सभी इसी गुण में निपुण थे। पारिवारिक समारोह में रसोईघर से जुड़ी बातों पर जब चर्चा होती तो दीविशा सोचने पर विवश हो जाती कि यह भी कोई मुद्दा होता है, जिसपर चर्चा होना जरुरी है? पर धीरे-धीरे वह समझ गयी कि जिंदगी का यही मुद्दा सर्वोपरि है क्योंकि यही रसोईघर पारिवारिक सुख का आधार अर्थात नींव होता है। इसी रसोईघर से प्यार, सौहार्द, सहयोग की सर्वोन्मुखी उन्नति के द्वार खुलते है। दीविशा भी अब इस रसोईघर की महत्ता समझने लगी। इसलिए वह भी इन बातों में उल्लसित होकर रस लेने लगी।
तभी तो अपनी कमी को समझते हुए उसका आंकलन करने के बाद भी उसने कभी अपनी अधिरता व घबड़ाहट को अधीर व विचलित होने नहीं दिया। वह खामोशी से वहाँ के रीत-रिवाज पर अपना ध्यान केंद्रित करके सीखने और अपनाने लगी। 
सुबह का खाना ननद रश्मि ही बनाती थी। दीविशा रसोईघर में उनका पूरा सहयोग करती, जैसे- मसाला पीसना, आँटा गूंथना, सब्जी काँटना, लोगों को नाश्ता-खाना आदि देना। काम से दीविशा ने कभी मुँह नहीं चुराया। इस बीच वह रश्मि के खाना बनाने की क्रिया को बहुत ध्यान से देखती थी। धीरे-धीरे वह भी इस काम में निपुण होने लगी। ससुराल में जितनी भी महिलाएं थी, सभी पाक कला में निपुण थी। दीविशा को सभी का प्यार और सहयोग मिला। तभी तो उसे भी यह काम रुचिकर लगने लगा। अब उसे रसोईघर में घबड़ाहट नहीं होती थी। ससुराल की सीख काम आई। अब दीविशा अपनी गृहस्थी में आने वाले मेहमानों की आवभगत पूरी निष्ठा से करती।
       समय बीतता गया। दीविशा के बच्चे बड़े हो गये। उनकी शादियाँ भी हो गई। रसोईघर में बच्चों की नई व्यवस्था और नये तरीका ने रसोईघर में अपना पैठ बनाने लगी। रसोईघर की पुरानी प्रथा और खुशहाली धूमिल पड़ने लगी। रसोईघर की वह व्यवस्था, वह खुशी व वह मजा अब दीविशा को नजर नहीं आता था, जिसका रसास्वादन वह अपने समय में कर चुकी थी। आने वाले रिश्तेदारों के साथ  खाने और खिलाने की खुशी व मजा अब उतना नहीं दिखता था, जितनी खुशी पहले थी। आधुनिकता के नये दौर में अब लोगों की या रिश्तेदारों की कौन कहे..अब अपने ही भाई-बहनों के बच्चे बोझ लगने लगे थे।
समय में आये इस परिवर्तन और मानसिकता ने दीविशा के रसोईघर की चूलें हिलाकर रख दी। परायों की कौन कहें, अब अपनों में भी रुची और सहूलियत की कमी हो गई। कोरोना काल ने इस सोच को और ज्यादा बढ़ावा दे दिया। अब लोग और पूरी तरह एकाकीपन में सिमटकर रह गये। रिश्ते से रिश्ते की समझ अब दूरियों में बदलने लगी। 
खुद पकाओं, खुद खाओं का फार्मूला विकसित हो गया। यह फार्मूला कब बदलेगा? बदलेगा भी या नहीं? भविष्य के अंधकार में डूबा यह प्रश्न कितनों के मन में कौंधता है? कौंधता भी है या नहीं... दीविशा के समझ से अब परे था। पर संसार परिवर्तनशील है। एक दौर जाता है, तो दूसरा आता है। दूसरा जाता है, तो पहला फिर आता है। उम्मीद की यही किरण जीने की राह आसान करता है। दीविशा की खुशियाँ भी इन्हीं उम्मीदों पर टीकी है कि नया सबेरा फिर आयेगा। नये दौर में एक बार फिर सब अपने और पराये भी मिलकर सब अपने ही हो जायेंगे।
 

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