सीख मिल गई (संस्मरण)

अंडमान निकोबार के यात्रा के समय पोर्ट ब्लेयर के एक सुंदर बीच पर लहरों से अठखेलियाँ करने का मन किया तो बालू में ऐसी जगह बैठ गई, जहाँ लहरें बड़े वेग से आ रही थी। आती हुई लहरें मुझे भीगोती और तरंगित करती, फिर वे वापस लौट जाती। मुझे लहरों की वजह से बहुत मजा मिलने लगा। मैं उसी में मगन हो गई।

अचानक मेरी नजर लौटती हुई लहरों के बाद नीचे से सरकती बालू पर पड़ी, तो मुझे बालू पर ढ़ेर सारे जीवित सीप बिलबिलाते हुए दिखें, जो झटपट या तो लहरों के साथ वापस चले जाते या बालू में छेद बनाकर उसमें समा जाते।
मुझे सीपों के बालू में घुसने की क्रीड़ा बहुत मनोरंजक  लगने लगी। वेग से लहराती हुई लहरों का आनंद अब मंद पड़ने लगा। मैं अब भी भींगती, पर अब मेरी सतर्क चंचल निगाहें बालू पर बिखरी सुंदर सींपों पर ज्यादा टिकने लगी। सुंदर, रंग बिरंगे, विभिन्न आकारों वाले जीवित सीप मुझे बहुत आकर्षित करने लगी। अब मेरा रुझान बदल गया। मैं लपककर सबसे सुंदर सीप को पकड़ती और अलग रख लेती। कभी-कभी सीप पकड़ने के लिए मुझे फुर्ती भी दिखलाना पड़ता था। बालू में घुसते सीप मुझे उत्तेजित करने लगे। मैं बच्चों की भांति जुनूनी बन गई। मैं बालू में समाती सीप को पकड़ने के लिए अपना हाथ बालू में घुसाकर भागते सीप को आखिर पकड़ ही लेती थी। मैं अपने आनंद में भूल ही गई कि मैं क्या कर रही हूँ और इसका अंजाम क्या होगा?
मेरे इस खेल में ढ़ेर सारा सीप इकट्ठा हो गया। मैं गर्व से इतराती हुई अपने इकट्ठा किए सीपों को देखती और आनंदित होती कि घर जाकर इसे बच्चों को दिखलाऊंगी और इसे घर के शोपीसों के बीच में सजाऊँगी।
पर मेरा सपना उस समय टूटकर बिखर गया जब एयरपोर्ट पर चेकिंग के समय मेरे अटैची को अलग रख दिया गया। मैं भौचक्क सी चारों तरफ देख रही थी कि अटैची को खोलने का संकेत मिला। मैं अटैची खोली तो मेरे जतन से संजोए गये सीपों वाले पैकेट को निकाल कर उसमें से सात-आठ सीप को मुझे पकड़ाकर बाकी को वे अपने पास अलग सुरक्षित जब्त करके रख लिये।
इस घटना से मुझे बहुत बड़ी सीख मिली। यदि चेकिंग में सीपों को निकाला न जाता तो मुझे अपनी गलती का एहसास भी नहीं होता।
अपने क्षणिक सुख के कारण मैंने सीपों की जान ली।  अपने द्वारा निरीहों पर किए गये अत्याचार को महसूस करके मैं स्वयं को पाप की भागीदारी और ठगी हुई महसूस करके दुखी होने लगी। अब पछताये होत क्या,जब चिड़िया चुग गई खेत। मेरे सुखद पलों के बीच यह एक बदनुमा दाग बन गया, जो मेरे दिल को तार- तार किए जा रहा था। 
मैं आज भी अफसोस से तिलमिलाती हूँ कि यदि मुझे ऐसी कोई जानकारी पहले से होती, तो न इन सुंदर सीपों की जान जाती और न मुझे अफसोस की अग्नि में झुलसना पड़ता। वह दुखद पल आज भी याद करके मैं दुखी होती हूँ और अफसोस करती हूँ। और आगे ऐसी कोई गलती न करने की प्रतिज्ञा भी करती हूँ।

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शंखनाद (कविता)