दो पाटों में झूलता मन (कविता)

दो पाटों में 
क्यों बाँटा है?
नारी मन की 
अभिलाषा को।
व्याकुल मन
पूछ रहा है,
बाबुल के तड़पते    
अरमानों से।                            

एक अतीत का
बीता पल था,
मस्ती भरे
नादानी का।
दूसरा आने 
वाला है आगे,
जिसे निभाना
बाकी है।

भूलना पड़ेगा
बचपन की चंचलता,
व युवा मन की
तरुणाई को।
निभाना पड़ेगा
अब मुझको,
ससुराल की
बड़ी जिम्मेदारी को।

दो झूलों पे 
झूलता मन,
कभी इधर तो 
कभी उधर है।
कैसे कुशलता से
निभा पाऊंगी?
मैं बनने वाली
नयी रिश्तेदारी को।

दो घाटों में
विचरते मन को,
अब एक जगह
समेंटना है।
इसी सीख की
चुन्नी तुमने,
विदा समय मुझे
ओढ़ायी थी।

पर बाबुल तुमने
ये नाइंसाफी,
क्यों की मुझ 
पर भारी?
तेरी लाडली को
जीना पड़ेगा,
बिसराकर अब
तेरी जुदाई।

पर भूलना मेरे 
वश में नहीं है,
बाबुल तेरी 
महकती कुटिया को।
विचरता रहेगा
मेरा मन-मयूर,
मायके-ससुराल
के गलियारे में।
 

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