भूटान की यात्रा (यायावरी)

दिल में आज भी बसी है भूटान की खूबसरत वादियाँ

प्रकृति के मनमोहक नजारों की खूबसूरत सम्पदा को समेटे है हमारा पड़ोसी देश - भूटान। जहाँ के रोम रोम में प्रकृति के अद्भुत व उत्कृष्ट नजारों का भण्डार समाहित हो, जहाँ की सादगी, सुंदरता और यातायात व्यवस्था ने दिल जीत लिया हो, ऐसे सुंदर भूटान देश में घुमकर मन को असीम शांति, सुकून और खुशी मिली ।
 
बेटी ने अपने पारिवारिक कुनबें के साथ इस यात्रा में हम पति-पत्नी को भी सम्मिलित किया तो मन प्रफुल्लित हो गया। हम लोग लखनऊ से दिल्ली होते हुए जलपाईगुड़ी पहुँचे। रात होटल में विश्राम के बाद सुबह भोर की लाली के बीच ही सुहाना सफर करके हम जलगाँव होते हुए फुंशलिंग पहुँच गये।
 
भुटान जाने के लिए फुंसलिंग में पास बनवाना पड़ता है, हम लोगों के पास वोटिंग आई कार्ड और  बच्चों के लिए बर्थ सार्टिफिकेट था। जो पास बनवाने के लिए जरुरी होता है।
पास बनने के बाद हम थिम्पू के लिए वैन से निकल पड़े। रास्ते में प्रकृति के सुंदर नजारे का अवलोकन करने में बहुत मजा मिला। उमड़ते-घुमड़ते बादलों का हुजूम जब गगनचुंबी पहाड़ों पर इठलाती, झूमती और रंग बदलती हुई अठखेलियाँ करती तो हम उन्हें महसूस और आत्मसात करने में पीछे नहीं रहे।
 
विशालकाय पहाड़ों की श्रृंखलाओं के बीच से निकलती झील-नदियाँ भी मन को बहुत लुभा रही थी। सड़कों पर सरकती गाड़ियों की कतारें, आसपास बड़े-बड़े पेड़,नक्काशीदार छोटे-छोटे घर और बादलों की चादर ओढ़े घाटियाँ बेहद रोमांचकारी थी। कई बार तो सड़क पर बादलों का ऐसा डेरा जम जाता था कि आगे चलती गाड़ियाँ तक दिखती नहीं थी, लेकिन इंडीकेटर्स की जलती-बुझती बीप करती बत्तियों से आगे बढ़ने का रास्ता साफ पता चलता था और हमारी गाड़ी धीरे-धीरे गतिशील रहती थी।
 
हमने चाहला व्यू प्वाइंट और टाइगर नेस्ट मोनेस्ट्री से पहाड़ की उँचाइयों को और बर्फीले हवाओं को महसूस किया तो वहाँ के आसमान पर रंगों की खूबसूरत छटा ने तो दिल जीत ही लिया। यहाँ के नदियों के पत्थरों पर बैठकर उसके साफ-सुथरें ठंड़े बहते हुए लहरों में पैर डालकर छई-छपा-छई करते हुए बच्चे और बड़ो ने खूब मजा लिया। पानी की स्वच्छता व शीतलता ने हमारा दिल जीत लिया।
स्वच्छता के लिए यहाँ पालिथीन से बनी वस्तुओं पर पूरी तरह से रोक है। यहाँ सिगरेट-बीड़ी और तम्बाकू पूरी तरह प्रतिबंधित है। यहाँ के लोग सुपाड़ी खाते है। यहाँ के लोग शिकार नहीं कर सकते है। नानवेज भारत से जाता है।
यहाँ का धर्म बौद्ध धर्म है। यहाँ थल सेना है। पर जलसेना और वायुसेना नहीं है। यहाँ का राष्ट्रीय खेल तीरंदाजी है। 
यहाँ के लोगों की  सादगी और संवेदनशीलता ने मन को जीत लिया। यहाँ के लोगों का पहनावा एक ही जैसा था। जिसके कारण ये अलग ही नजर आते थे। हम लोगों ने यहाँ के परिधानों में अपनी तस्वीर खिंचवाया जिसके कारण लोगों से घुलने-मिलने का अवसर मिला। 
शादी के बाद यहाँ की लड़कियाँ ससुराल नहीं जाती है। बल्कि लड़के ही लड़कियों के पास आते है। सम्पत्ति भी लड़कियों को ही मिलती है।
 
खरीदारी - खरीदारी में भी हम पीछे नहीं थे। हाथ के बने छोटे-बड़े पर्स, माला-बाली-कंगन के साथ नक्काशीदार आकर्षक डिजाइनों वाले गिफ्ट खरीदें। म्यूजियम में एक बिना हाथ वाले लड़के के पैरों से बनी कला कृतियों को देखकर हम दंग रह गये। हमने उसके कला की भूरी-भूरी सराहना की। उसके कला की इज्जत उसके कलाकृतियों को  खरीद कर की। जिस पर उसने अपने पैर से अपना नाम और तारीख लिखकर हमें दिया।यहाँ के नक्काशीदार डिजाइनों से बनी कलाकृतियाँ अधिकांशतः इमारतों के दिवारों और दरवाजों पर खूब देखने को मिली, जो बहुत आकर्षक थी।
 
थिम्पू- यह भूटान की राजधानी और बड़ा शहर है। हम लोग थिम्पू में विशाल बौद्ध मठ, राजा साहब का घर, स्टेडियम, जू, बोटेनिकल गार्डेन, म्यूजियम पार्क, बाजार और हैंडी क्राफ्ट मार्केट घूमे। 
 
पुनाखा घाटी- पुनाखा घाटी में हमने झूले वाले ब्रिज से उस पार जाकर मठ देखे। नदी में राफ्टिंग की।
 
पारो- पारो में एयरपोर्ट के पास ही हमारा होटल था। आते-जाते एयरपोर्ट देखने का मौका कई बार मिला। जहाज के उड़ान भरने और नीचे लैंड करने के नजारों ने मन को तृप्त कर दिया। यहाँ के पहाड़ो के बीच से जहाज को उड़ाना और उतारना बहुत कठिन था। 
 
यातायात व्यवस्था का लुफ्त -
यहाँ पर ट्रैफिक लाईट नहीं है। यातायात व्यवस्था बहुत स्मूथ व सुदृढ़ है, जिसकी अवहेलना कोई नहीं करता है।
यहाँ की सड़कों पर घुमते हुए अचानक जब हमारे पावं जेब्रा क्रासिंग पर ठहर कर यह सोचने पर मजबूत हुए कि आते जाते वाहनों के बीच कैसे सड़क पार करें कि तभी यह देखकर घोर आश्चर्य हुआ कि जेब्रा क्रासिंग के दोनों तरफ के वाहन अपने आप रुक गये है। हम बेहिचक सड़क पार कर लिए तो गाड़ियाँ अपने आप चल पड़ी। इस एहसास का लुफ्त उठाने के लिए हमने दुबारा जेब्रा क्रासिंग पर पैर रखा ही था कि आती-जाती गाड़ियाँ अपने आप रुक गई तो हमने झटपट सड़क पार कर लिया। यहाँ की गाड़ियाँ बहुत स्मूथ और सरल तरीके से चलती थी। ओवरटेकिंग की अफरातफरी यहाँ कहीं देखने को नहीं मिली। एक बार किसी वीआईपी के आने का आभास हुआ तो गाड़ियाँ अपने आप किनारे जाकर खड़ी हो गयी।
 
यहाँ के लोगों की  सादगी और संवेदनशीलता ने मन को जीत लिया। यहाँ की खास बात लगी कि भूटान के लोगो के मन में अपने राजा  जिग्मे घेसर नामग्याल वांग्चुक के प्रति असीम श्रद्धा और विश्वास था। राजस्व व्यवस्था के तहत यहाँ शिक्षा और इलाज का खर्च मुफ्त था। यहाँ के लोग बेहद सीधे संवेदनशील और खुशहाल लगे। जिसके कारण इन लोगों ने हमारा मन जीत लिया।
 
वैन का ड्राइवर लुंगटन इस पूरी यात्रा में हमारे साथ पारिवारिक सदस्य के रुप में घुलमिल कर रहा। दो दिन उसकी पत्नी भी हमारी यात्रा की भागीदारी बनी। तब हमारे बीच बहुत सी बातें हुई, जिससे हमारा मनोरंजन भी हुआ और हमें भूटान की थोड़ी-बहुत जानकारी भी मिली।
खानपान- खाने में वेज और नानवेज दोनों का स्वाद बहुत अच्छा था। खाने में लाल चावल और एमा दात्शी बहुत अच्छा लगा।
यहाँ की यात्रा बहुत सुखदायी और मनोरंजन से पूर्ण था। यहाँ से लौटने के बाद भी मन यादों में कई बार यहाँ के अद्भुत प्राकृतिक नजारों के बीच पहुँचकर विचरण करने लगता है।
 

No comments:

शंखनाद (कविता)