दर्द भरी दास्तान उपेक्षित वस्त्रों की (व्यंग्य)

पैजामा, लूंगी और मैक्सी जो वर्षों से उपेक्षित जीवन जी रहे थे। उपेक्षित इस मामले में कि उनके मालिक-मालकिन उनका उपयोग सिर्फ घर में ही अर्थात रात में सोते समय ही अधिकतर करते थे। दुख तो उन्हें तभी होता था, जब घुमने की बारी आती, देश-दुनिया को समझने-बूझने या मनोरंजन का समय आता तो मालिक उन्हें बेरुखी से उतारकर खूंटी पर लटका देते और दूसरे वस्त्रों में सजधज कर सुशोभित हो जाते। फिर बड़े गर्व से वे बाहर चले जाते और जाते समय उसकी तरफ नजरें उठाकर भी नहीं देखते। यह उनका अपमान नहीं तो और क्या था? जिसे वे चुपचाप अभी तक खामोशी से सिर्फ इसलिए सहते और फिर टसूएं बहाकर रह जाते...। पर कुदरत की लीला अपरम्पार होती है। यहाँ देर है, पर अंधेर नहीं। 
 कहते है एक दिन किस्मत सबकी बदलती है, तो आज उपेक्षित वस्त्रों की किस्मत बदल चुकी थी। तभी तो अपमान का घूँट पीने वाले उपेक्षित वस्त्र आज लाॅकडाउन के इस दौर में सम्मानजनक जीवन जी रहे थे। तभी तो वही उपेक्षित लुंगी, पैजामा और मैक्सी आज मंद मंद विजयी मुस्कान बिखेरते हुए गौरवान्वित महसूस कर रहे थे। क्योंकि आज वही वस्त्रों के राजा थे। मालिक-मलकिन उन्हें ही प्यार से पहनते, सहेजतें और बहुत सम्भाल कर रखते थे। उपेक्षित वस्त्र मालिक-मालकिन के इस  अप्रत्याशित प्रेम से अति प्रसन्न थे।
उनकी यह बचकानी सी ठीठोली वाली हँसीं अलमारियों में बंद पड़े साफ-सुथरें, खूबसूरती से सजे, उजले प्रेस किए हुए पैंट-शर्ट, सलवार सूट और साड़ी-ब्लाउज को रास नहीं आ रहा था। ये पैंट-शर्ट और साड़ी बहुत मायूस थे। काफी दिनों से इस अलमारी में बंद रहने से उनका जी इतना उब चुका था कि वे उबलते हुए इस अलमारी के दायरे से बाहर बुलबुलों के रुप में छंलाग लगाने को बेचैन थे। 
 लॉकडाउन के ऐसे मुसीबत भरे समय में जब उन्हें बाहर जाने का मौका नहीं मिला, तब वे अपने आँसुओं को पोछते हुए निरीह व बेबस आँखों से वे एक दूसरे को निहारने लगे। तब दुखी मन से अपने मन की भड़ास निकालते हुए साड़ी बोली," कैसा पतझड़ वाला बोरिंग व नीरस समय आ गया है आज। जिसे मालिक-मालकिन मुड़ा-चिमुड़ा होने पर भी घर आकर पहन लेते थे। कभी प्रेस भी नहीं कराते थे। उन्हीं उपेक्षित पहनावे पर मालिक आज अपना सारा प्यार और ध्यान लुटा रहे है। पर आजकल इनके बदले घमण्डी भाव तो देखो...कैसे इतराते और जलवा बिखेरते नजर आ रहे है। आजकल इनका भाव सातवें आसमान पर बैठा है क्योंकि मालिक इन्हें रोज अपने हाथ से प्रेस करते और पहनते है और अक्सर बाहर तक भी टहलनें चले जाते है। मालिक की बैमानी देखो,  जब  हमारी बारी थी, तब हमें गठरी बनाकर प्रेस वाले के यहाँ ले जाकर पटक देते थे। प्रेस करने के लिए कभी हमें प्यार से हाथ भी नहीं लगाये। मेरा तो दिल जलता है। मैं तो इनके इतराते हुए सलोनेपन को देखकर मन ही मन में दिन-रात जलती-भुनती व कुढ़ती रहती हूँ। मुझसे ये सब बर्दाश्त नहीं हो रहा है।"
"सब्र करो, बहन। सब्र करो। जल-भूनकर अपना दिल मत जलाओ। कभी हम इतराते और अपना जलवा दिखाते थे। आज इनकी बारी है, तो इन्हें आज हँस लेने दो।  जीवन धूप-छांव का दौर होता है। ये तुफान के आने-जाने का जलवा है। पहले हमारी चलती थी, अब इनकी चल रही है। कोरोना की महामारी रुकने तो दो। फिर देखना हमारी बारी कैसे लहराकर आयेगी। तब हमीं मालिक-मालकिन के बदन को सुशोभित करेंगे।" ब्लाउज हँसकर साड़ी को टोकती हुई बोली।
" यह तो ठीक है। पर हम आज जो बंद होने के कारण घुट रहे है, उसका क्या करे?" साड़ी उदास हो कर सिसकती हुई फिर बोली।
 उन दोनों की फालतू किचकिच से परेशान हो कर टाई बोली," चुपचाप आराम करो। ऐसा सुनहरा मौका बार-बार नहीं मिलता है। रोज बाजार-माल और ऑफिस में  इधर-उधर घिसे और रगड़े जाते थे। ऐसे में घिस-घिसकर फट जाते थे। अब शांति से बैठने का अच्छा मौका मिला है तो उसमें भी बेचैनी। मुझे देखो, आराम से मस्ती मारता हूँ। मालिक मुझे कभी-कभी किसी विशिष्ट अवसर पर ही याद करते है। बाकी दिनों में तो मैं चैन की बंसी बजाता हुआ आराम फरमाता हूँ। मुझे तो किसी से कोई शिकायत या जलनखोरी नहीं होती है। तुम भी आराम से चैन की बंसी बजाओ। और शोर मचाकर सबको परेशान मत करो।"
यह सुनकर कमीज गदगद हो गया,बोला," केवल चिल्ल-पों मचाने से कुछ नहीं होगा। टाई की तरह समझदार और बड़े दिल वाले बनों। आराम करने का समय है तो खामोशी से आराम करो। जब तुम्हारी बारी आयेंगी, तब तुम्हें फिर मौका मिलेगा। तब तुम अपनी महत्ता और गुरुर दिखाना। अभी बेकार की बकवास बंद करो।" 
 सबकी किचकिच से पैंट उब चुका था। वह शांत भाव से बोला," ये बेकार का घड़ियाली आँसू बहाना छोड़ो। मैं कह रहा था कि सुख-दुख में जो समान भाव से चलता है, वही सुखी होता है। हर परिस्थितियों में जीना आना चाहिए, तभी तो जिंदगी समान गति से चलायमान रहती है। अब मुझे देखो, मैं चैन से आँखें बंद करके सोने जा रहा हूँ। कोई भी मेरी नींद में खलल ड़ालनें का प्रयास नहीं करेगा। वरना मैं हो हल्ला मचाकर सबका जीना हराम कर दूंगा।" पैन्ट जोर से सबको धमकाते हुए बोला और फिर जम्हाई लेते हुए करवट बदलकर सोने लगा।
" कह तो सब लोग ठीक ही रहे हो। आराम और मौज करो। जब अपनी बारी आयेगी, तब की तब देखी जायेगी। अभी से सर क्यूं खपाये। मायूसी में क्यों जीए। बाहर निकलने का जब मौका मिलेगा तब बाहर जाकर काम करेंगें।" यह कहकर साड़ी सोने लगी तो अलमारी में सन्नाटा छा गया। सब बारी-बारी अपनी आँखें बंद करके अपने-अपने ख्यालों में मगन हो गये।।

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शंखनाद (कविता)