बुढ़ापे की लाठी (लघुकथा)

नींद से जागकर रामलाल जब बिस्तर पर बैठे तब वे अपनी लाठी टटोलने के लगे। जब उन्हें अपनी लाठी नहीं मिली तब वह जोर से आवाज लगाये," अरे सुगना बेटा, सुन तुमने मेरी लाठी कहाँ रख दी। मिल नहीं रहा है।" बाबा की इतनी आवाज सुनकर सुगना दौड़ा हुआ आया, बोला,"बाबा, लाठी की क्या जरुरत है। मैं हूँ ना। मुझे लाठी समझकर पकड़ लो, फिर जहाँ चलना है चलो।"
"अरे, तुम्हें लाठी क्यों समझु? तुम मेरे लाठी ही तो हो।" यह कहकर रामलाल सुगना की सहायता से उठे और सुगना के कंधें पर हाथ रखकर चलने को तत्पर हुए कि तभी सुगना की छोटी बहन चुनिया जो सुगना के पीछे ही कमरे में आ गई थी, वह आगे बढ़कर बाबा का दूसरा हाथ पकड़ ली। रामलाल बोले चलो, बाहर बैठा दो। बाहर के ठंड़ी हवा का मजा जरा मैं भी ले लू। और थोड़ा टहल भी लू। शरीर बैठे-बैठे अकड़ गया है।"
रामलाल को बाहर कुर्सी पर बैठाकर दोनों बच्चे खेलने लगे। दोनों बच्चों के कारण रामलाल बहुत संतुष्ट थे। इस बुढ़ापे में भी वे अधिकतर बिना लाठी के ही चलते थे, क्योंकि जब भी उन्हें विशेष सहारा की जरूरत पड़ती दोनों बच्चे हाजिर हो जाते।
अब कोरोना काल में समय बिलकुल बदल गया है। सोशल डिस्टेंडिंग का जब से फार्मुला लागू हुआ है तब से रामलाल का जीना दुश्वार हो गया। जब भी उन्हें सहारा की जरुरत पड़ती और वे सुगना को आवाज लगाते तब सुगना दौड़कर तो आता था, पर दरवाजे पर ही ठिठक कर अंदर झांकता और बाबा से बोलता," बाबा, आपकी लाठी बिस्तर के सिरहाने रखी है। आप उसी का सहारा लेकर बाहर आ जाओ।"
एकदिन रामलाल को बर्दाश्त नहीं हुआ तो वे जोर से चिल्ला पड़े,"अरे, तुम लोग अंदर क्यों नहीं आ रहे हो? मुझे पकड़ो या न पकड़ो पर मेरी लाठी तो पकड़ा दो। जाने कहाँ रख देते हो, तुम दोनों।"
सुगना अपने मुँह पर अंगुली रखकर चुनिया को न बोलने का संकेत देकर दबे पांव अंदर आया और बाबा को लाठी पकड़ाते हुए धीरे से फुसफुसाया, बोला, "बाबा, आपकी तबीयत ठीक नहीं रहती है ना। हमेशा छींकते और खाँसतें रहते है, इसीलिए माँ ने आपसे दूर रहने को बोला है। अभी माँ नहीं है, इसलिए मैं आपको पँहुचा देता हूँ, लेकिन आप अपनी लाठी अपने पास ही रखियेगा ताकि माँ को पता न चले कि मैंनें आपको पँहुचाया है।"
रामलाल को काठ मार गया। बाहर जाने की अपेक्षा वे वहीं बिस्तर पर धम्म से बैठ गये। 
बाबा के संबल बनने वाले बच्चे आज कोरोना काल में बाबा से दूर होते जा रहे थे। ये रामलाल के लिए बहुत कष्टकारी था। 
लेकिन होनी को कुछ और ही मंजूर था। ऑफिस से लौटने वाले रामलाल के बेटा जोगेंद्र ने सुगना की बातें दरवाजे पर खड़े होने के कारण सुन लिया था। चाय पीने के बाद वे सुगना व चुनिया के साथ उनकी माँ शीला को अपने पास बुलाकर समझाये, बोले," बेटा, सोशल डिस्टेंडिंग का मतलब ये नहीं होता है कि रिश्ते की नींव ही खोद दो। बाबा जैसे आज है, वैसे ही कल भी थे। तुम्हें या चुनिया को क्या कभी कोई बीमारी उनसे हुआ? नहीं ना। तो फिर आज ये नयापन का सनक क्यों सवार है तुम लोगों पर? हमें तो कोरोना बीमारी से बचने के लिए उन लोगों से दूर रहना है जो बाहर से आ रहे है। बाहर से आने वाले  कोरोना के कैरियर बन सकते है, इसलिए हमें उनसे दूर रह कर कोरोना बीमारी बनाने वाले चेन को तोड़ना है, ना कि आपसी रिश्ते को ही तोड़-मरोड़ कर रख देना है। आपसी स्नेह, सम्बल और सहयोग का रिश्ता कायम रखकर पारिवारिक सुख का सम्मलित रुप से उपभोग करो और एक दूसरे का साथ निभाओ। इस संकट काल में पारिवारिक एकता को कायम रखकर ही पारिवारिक खुशियाँ बटोरी जा सकती है। इसलिए ऐसे संबन्धों को जीवंत रखो।"
दूसरे कमरे में बैठे रामलाल के आँखों से संतुष्टी व खुशी के आँसू टपकने लगे। वे बुदबुदाये,' जिस घर में ऐसा समझदार बेटा होगा, वहाँ के बुजुर्गो को किसी भी बात की चिंता नहीं करना चाहिए।'
उसी समय सुगना दौड़ता हुआ उनके पास आया, बोला," बाबा चलिए, आपको थोड़ी देर बाहर ठंड़ी हवा में बैठा दे।"
" नहीं बेटा, आज देर हो गया है। कल चलेंगे..बाहर बैठने। जरा देखना, मेरी लाठी कहाँ है?"
"बाबा, अब लाठी का क्या काम है? जब जरुरत होगी आवाज लगाइयेगा, मैं आ जाऊंगा। मैं हूँ ना आपका प्यारा लाठी...आपके पास।" इतना बोलकर सुगना उछलते-कूदते  हुए खेलने चला गया तो रामलाल आराम करने लगे। उनके चेहरे पर संतोष व सुकून की छाया मड़रा रही थी।

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