मस्त और खुश रहना (कविता)

मस्त व खुश रहने की लीला,
सबके समझ में आती नहीं है।
जो स्वयं ही मस्त रहते है,
अच्छाईयों को वही समझ पाते है।
वे ही खुशियाँ खुद बटोरते है,
फिर मुक्त भाव से उन्हें लुटाते है।
जो मायूसी के घेरे में कैद है,
वे निराशा के जंजीरों में जकड़े जाते है।
आगे कभी वे बढ़ते नहीं है,
ठिठके कदम से सबको रोकते है।
इसलिए दूर रहकर ऐसे लोगो से,
अपने कदम को आगे बढ़ाना है।
सदैव खुश रहने का भाव अपनाओ,
इसे ही जीने का सम्बल समझो।
लोगों की खुशी में सम्मिलित होकर,
लोगो को उन्नति की राह दिखाओ।
प्रकृति की सुंदरता में रम जाओ,
फिर चारों ओर हर्षित हो उल्लास भरो।
यही जीवन का असली सम्बल है,
यही जीने का सच्चा मूलमंत्र है।

No comments:

शंखनाद (कविता)