करे कोई, भरे कोई और (लघुकथा)

शैक्षणिक काल में कभी किसी खड़ूस अध्यापक से सामना हो जाये तो कक्षा में कोई ना कोई ऐसी विचित्र घटना हो जाती है जो जीवनपर्यंत याद आती रहती है।
राधिका को भी इण्टर में पढ़ते समय की अपनी एक घटना अक्सर स्मृतिपटल पर घूम जाती है। यादों में भटकते हुए उसे ऐसा लगा जैसे कल की ही बात है, जब भौतिक विज्ञान के अध्यापक जावेद सर त्रैमासिक परीक्षा की कापियाँ दिखाने कक्षा में आये थे। बड़ा सा क्लास रूम जिसमें 60 बच्चे खचाखच भरे बैठे थे। राधिका अपने कक्षा की अकेली छात्रा थी। बाकी सभी लड़के थे। जीवविज्ञान और गणित के छात्र एक साथ एक कमरे में भौतिक विज्ञान पढ़ते थे।
कापी देखकर अधिकतर छात्रों के मुँह लटक गये थे क्योंकि 15-20 छात्रों को छोड़कर सभी छात्र फेल थे। इतने बड़े क्लास में चीं-चीं,चूं-चूं करने की हिम्मत किसी छात्र में नहीं थी। लटके चेहरों ने सर को मंद-मंद कुटिल मुस्कान बिखेरने का मौका दे दिया। ऐसे में हँसते हुए सर ही बोले," देखा, आज तुम लोग मेरे इस पेन की नोंक के नीचे कितने विवश व परेशान नजर आ रहे हो। अब अगर किसी ने मेरे सामने चिल्ल-पौ करने की हिम्मत दिखाई, तो मैं इसी पेन की नोंक से उसे रगड़कर ऐसा मरोड़ दूंगा कि वह सर उठाने के लायक भी नहीं बचेगा।"
सर दो घड़ी सांस लेने के लिए रुके तो सब बेवकूफों की तरह एक दूसरे का मुँह ताकने लगे कि सर कह क्या रहे है?उनके कहने का उद्देश्य क्या है?
तभी सर आगे बोले," कुछ समझे कि नहीं समझे तुम लोग? अब इतना तो जान ही गये होगे कि नम्बर न लुटाने के कारण ही तुम लोग हमेशा मेरी बात मानोगे, वरना मेरे पास तुम्हारे मनमानी को रोकने का कोई उपाय नहीं होगा?
तुम्हारी तरह जब मैं भी विद्यार्थी था, तब मेरे भी मन में एक ही विचार हमेशा कौंधता था कि टीचर नम्बर देने में इतना कंजूसी क्यों करते है? मैं जब टीचर बनूंगा तब नम्बरों के मामले में इतना कंजूस नहीं बनुंगा। बच्चों को ढ़ेर सारा नम्बर लुटाकर मैं उन्हें मालामाल कर दूंगा। अध्यापक बनने के बाद पहली बार त्रैमासिक परीक्षा में मैंने नम्बर लुटाकर अपने मन की आंतरिक इच्छा पूरी कर ली। उस समय मैं बहुत खुश व संतुष्ट था।
पर होनी को कुछ और ही मंजूर था। तभी तो कक्षा के दो छात्र बहुत बदमाश निकल गए। एक बार मैं उनके गलत कामों से परेशान होकर उन्हें डाट रहा था। डाट का कोई असर उन पर नहीं देखकर मुझे क्रोध आ गया। मैं गुस्से से तिलमिला कर बोला यदि तुम लोग अपनी शैतानी बंद नहीं करोगे तो मैं तुम्हें फेल करके इसी क्लास में रगड़ने के लिए मजबूर कर दूंगा।  मेरे क्रोध पर ठंडा पानी तब पड़ गया, जब उनमें से एक छात्र मेरा खिल्ली उड़ाते और हाथ नचाते हुए बोला कि सर, अब आपके हाथ में कुछ नहीं है। आप अभी इतना नम्बर पहले ही लुटा चुके है कि यदि आप जीरो भी देंगे, तब भी हम आसानी से पास हो जायेंगे। उनकी खिल्ली और अपनी मजबूरी ने मुझे उस दिन बेबसी का एसास कराया। तभी तो मैं उसी दिन बदलने पर मजबूर हो गया। हमने दृढ़ निश्चय कर लिया कि अब मैं बच्चों को अपनी मुट्ठी में कैद रखूंगा। आज तुम लोग मेरी इस पेन की नोंक के नीचे मजबूर हो। अब किसी में हिम्मत हो तो शैतानी करके दिखा दे। और यदि कभी किसी नेकिया भी तो इसी पेन से रगड़ दूंगा क्योंकि यही मेरा हथियार है।"
कुछ देर बाद सर तो चुप हो गये।
पर राधिका सोचने लगी कि आज तो याद करके मुस्कुरा रही हूँ, पर उस दिन तो यही महसूस हुआ था कि,' करनी किसी की,और भुगत हम लोग रहे है अर्थात करे कोई, भरे कोई और।

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शंखनाद (कविता)