नारी (कविता)

बेपेदी का लोटा जैसे,
लुढ़कता है इधर-उधर।
वैसे ही नारी तू, सौम्य समर्पण भाव लिए,
डोलती है चहूँ ओर।
कभी जब बनती है बहन तू,
भाई को राखी बाँधती है।
भाई के स्नेह सूत्र में बँध जाती है,
तब भाई भी नेह प्रीत लुटाता है।
कभी बनती है जब तू बेटी,
माँ-बाप की सेवा में तत्पर रहती है।
इसलिए माँ-बाप की छत्रछाया में,
अपने को सुरक्षित समझती है।
कभी जब तू सुकुमारी पत्नी है,
तब फिरती है सहचरी बनके।
पति के आलिंगन में समायी,
सुधारस बरसाती है हरदम।
तो कभी बनती है तू प्यारी माँ,
जब नन्हें-मुन्ने बच्चों की।
तब बहुमुखी प्रतिभा से सुसज्जीत,
चंहुमुखी चक्कर लगाती है।
चकरघिन्नी सा डोलता रुप तेरा,
सबको मतवाला करता है।
रहना चाहते है सब तेरे,
आँचल की मधुरमय छाया में।
तेरे दामन के संरक्षण में,
वे सुरक्षित महसूस करते है।
हरपल सबको तेरा सहयोग चाहिए,
तू ही सबके आसपास चाहिए।
आँचल में छुपाकर सर अपना,
सबको जिंदगी भर का सुकून चाहिए।

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