दोस्ती का फल (बाल कहानी)

इंजीनियरिंग राजकुमार का इकलौता बेटा जतिन था। जतिन की माँ नौकरी करती थी। जतिन के स्कूल जाने के बाद जतिन के मम्मी-पापा दोनों ऑफिस चले जाते थे। इसलिए दोपहर में स्कूल से आने के बाद जतिन घर में अकेला पड़ जाता था। वह अपना यूनिफॉर्म बदलकर खाना खाता, फिर थोड़ी देर आराम करने के बाद वह पार्क में खेलने चला जाता था। जतिन के कालोनी का पार्क सुरक्षित था,अतः वहाँ बच्चे निर्भिकता पूर्वक खेलते थे। जतिन भी अपने एकांत पल को पार्क में खेलकर ही बिताता था।

पार्क में खेलने के लिए राजू नाम का एक बच्चा भी आता था। राजू पार्क के पास के एक झोपड़ी में रहता था। उसका रहन-सहन बहुत साधारण था। उसके मम्मी-पापा मजदूरी का काम करते थे। अधिकतर बच्चे उसे अपने साथ खेलाने के पक्ष में नहीं होते थे। पर क्रिकेट के मैच में जब बच्चों की संख्या कम पड़ती थी, तब संभ्रांत परिवार के बच्चों को, जो राजू को अपने बराबर नहीं समझते थे, उनकी भी मजबूरी हो जाती थी कि वे राजू को अपने खेल में शामिल करें। 
धीरे धीरे राजू ने क्रिकेट टीम में अपनी जगह बना ली।अच्छा खेलने की वजह से राजू को सब अपने टीम में रखना तो पसंद करते थे, पर खेलने के बाद वे राजू को अपने साथ टहलने या बातें करने की छूट नहीं देते थे। इसलिए राजू उनके मित्र मण्डली में शामिल नहीं हो पाता था।
ऐसे नाजूक मोड़ पर जब सारे बच्चे समूह बनाकर अलग हो जाते, तब राजू मायूस होकर अकेले ही इधर-उधर घुमता,झूला झुलता या किसी बेंच पर बैठकर आने-जाने वालों को देखता था। 
घर में अकेला पड़ने के कारण जतिन अकेलेपन के दर्द को समझता और महसूस करता था। इसलिए जतिन अलग-थलग पड़े राजू का साथ निभाने लगा। जब मैच नहीं होता, उस समय वह राजू के साथ पार्क में टहलता, बातें करता और झूला झुलता था। अब जतिन और राजू की दोस्ती होने लगी थी। यद्यपि उसके अन्य साथी उनके इस दोस्ती से चिढ़ते थे और वे जतिन को राजू से अलग रहने की सलाह देते थे। और जतिन के न मानने पर वे जतिन की मम्मी से जतिन की शिकायत भी कर देते थे। यही कारण था कि जतिन भी अपने मम्मी-पापा के डॉट से डरता था। इसलिए वह राजू से खुलकर दोस्ती नहीं कर पाता था।
एकदिन मैच खेलते समय जतिन के माथे पर गेंद से बहुत तेज चोट लग गयी। सर से बहता खून देखकर सारे बच्चे मैदान छोड़कर भाग गये। राजू जतिन के बहते खून को देखकर डर गया। वह जल्दी से अपने हथेली को जतिन के माथे पर टिकाकर बहते खून को रोकने का प्रयास करने लगा। जतिन दर्द के कारण कराह रहा था। जब खून रुकता महसूस नहीं हुआ, तब राजू जतिन को लेकर अपने घर आ गया।
राजू की माँ गौरी जतिन के सर से बहते खून को देखकर घबड़ा गयी। वे जल्दी से डिटाल लाकर खून की सफाई की और पट्टी बाँध दी। गौरी के प्यार भरें स्पर्श को पाकर जतिन अपने दर्द को भूल गया। गौरी जतिन को बिस्तर पर लिटा दी। तभी राजू की छोटी बहन चंदा एक गिलास में गर्मागर्म हल्दी वाला दूध लाकर जतिन को देते हुए बोली," भैया, ये गरम-गरम दूध पी लो। तुम्हारा दर्द अभी छू-मंतर हो जायेगा। फिर तुम हँसने लगोगे। एकबार मुझे भी बहुत ज्यादा चोट लगी थी, तब माँ ने यही दूध पिलाकर मुझे ठीक किया था। उस समय ठीक होने पर मैं भी हँस पड़ी थी।" जतिन उठकर दूध पीने लगा। तभी जतिन की नजर चंदा के फ्राक को पकड़े हुए नन्हीं बच्ची चुन्नी पर पड़ गयी।

चुन्नी जतिन को एकटक घूर रही थी। जतिन ने हाथ के इशारा से चुन्नी को बुलाया। चुन्नी पास आकर जतिन के कुछ पूछने से पहले ही कड़क आवाज में बोली," भैया,  आपको किसने चोट पँहुचायी है। आप मुझे बताईए। मैं उसकी खूब पिटाई करुंगी।"
जतिन बोला," तुम तो बहुत छोटी हो। तुम कैसे बड़ें बच्चों को पीट पाओगी?"
"ऐसे।" चुन्नी हाथ को हवा में लहराते हुए बोली। तभी गौरी की कड़क आवाज सुनाई पड़ी," चुन्नी, वहाँ से हटो। भैया को परेशान मत करो। उन्हें सोने दो।"       
यह सुनकर चुन्नी बोली ," मैं उन बच्चों को सबक सिखाने आपके साथ जरुर चलूंगी। मुझे साथ लेकर चलना, भैया। मैं अभी फिर से आती हूँ।" यह कहकर वह वहीं बैठकर अपनी गुड़िया से खेलने लगी। फिर माँ से चिल्लाकर बोली,"माँ , मैं भैया को परेशान नहीं कर रही हूँ। मैं अपनी गुड़िया से खेल रही हूँ।"             
"यह मेरी प्यारी-चुलबुली बहन चुन्नी बहुत बातूनी व नटखट है। समझो एक तरह से सबकी नानी ही है। बातों से अपने सबका सर चाट लेती है। अब तुम थोड़ी देर आराम से सो जाओ। उठने पर मैं तुम्हें घर पहुँचा दूंगा।" राजू जतिन को चादर ओढ़ाते हुए बोला।
दर्द के इस मौके पर जतिन को परिवार का यह प्यार भरा एहसास बहुत भला लगा। वह चुपचाप लेटा, तो उसे नींद आ गयी। प्यार भरे एहसास के सुंदर छाँव में उसे बहुत सुकून की नींद आई।
शाम को राजू के पापा गोवर्धन घर आये। सारी बातें सुनकर वे घबड़ा गये। चूंकि जतिन का घर कोई नहीं जानता था , इसलिए गोवर्धन के सामने जतिन के घर खबर पँहुचाने की चिंता सताने लगी। वे जतिन के जागने की प्रतीक्षा करने लगे।
जतिन के मम्मी पापा जब शाम को घर आये तो वहाँ घर पर जतिन को न पाकर वे पार्क में आ गये। पार्क की घटना की जानकारी मिलते ही वे घबड़ा गये।
जतिन के नींद खुलने पर गोवर्धन जतिन को लेकर उसके घर जाने ही वाले थे कि जीतिन के पापा किसी बच्चे की सहायता से वहाँ पहुँच गये। जीतू अपने पापा के साथ घर चला गया। 
रास्ते में जतिन ने अपने पापा को बताया कि चोट लगने पर किस तरह उसके सारे साथी उसको छोड़कर मैदान से भाग गये। ऐसे समय में जब वह मैदान में अकेला हो गया था उस समय राजू और उसके परिवार ने ही उसकी बहुत सहायता की ।
यह सुनकर जतिन के पापा बोले," बेटा, जो मुसीबत में साथ निभाये...वही सच्चा साथी होता है। राजू तुम्हारा सच्चा साथी है। तुम उसके साथ खेला और पढ़ा करो।"
"पर पापा, वह तो स्कूल जाता ही नहीं है।" जीतू बोला तब राजकुमार ने पूछा,"क्यों?"
इस क्यों के जवाब में जीतू को याद आया कि किस प्रकार फीस जमा न होने के कारण राजू  का नाम स्कूल से काट दिया गया था।
जतिन ने पापा को सारी बातें बता दिया। तो राजकुमार बोले," ठीक है। मैं तुम्हारे दोस्त के पढ़ने की व्यवस्था शीघ्र करा दूंगा। तुम चिंता मत करो।"
घर आने पर जतिन दो-तीन दिन आराम किया। फिर वह खेलने जाने लगा। पहले वह राजू से दोस्ती के नाम पर डरता था। पर अब उसे किसी का डर नहीं था। राजू के परिवार से उसे परिवार का पारिवारिक प्रेम मिलने लगा। अब जतिन अकेला नहीं था। उसे एक भाई और दो बहनों का साथ भी मिल गया। 
एकदिन राजकुमार ने राजू का नाम स्कूल में फिर से लिखवा दिया। जिसके कारण राजू के स्कूल जाने का मार्ग खुल गया।
इस प्रकार दो अनमेल दोस्तों के दोस्ती से दोनों को दोस्ती का फल मिला। एक को अपनी शिक्षा आगे बढ़ाने का मौका मिला तो दूसरे को वह पारिवारिक माहौल मिला जो उसके मम्मी-पापा के अनुपस्थिति में उसे परेशान करती थी जिसके अभाव में वह सदैव उदास रहता था।
इस प्रकार दोस्ती का फल अनमोल होता है, जिसके रसास्वादन से दोनों दोस्त को सुखद एहसास की अभूतपूर्व अनुभूति मिलने लगी।

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