चेहरे पर मास्क (लघुकथा)

आधुनिक दौर की नई जरुरी पहचान मास्क से ढ़के चेहरे को शीशे में निहारती रमा अपना चेहरा देखकर सोचने लगी, ऐसे ही दुपट्टे से ढ़के छुपे चेहरे वाली लड़कियाँ जो सिर्फ अपनी चमकती आँखों से सबको घूरती हुई सड़क पर या कहीं और भी जब उसको दिखती थी, तब वह उनसे कितना खुन्नस खाती थी। आज उसका भी ढ़का चेहरा उसी रुप में तैयार हो कर बाहर निकलने को आतुर था।
 मास्क मुँह पर चिपका देखकर रमा सोच में पड़ गयी। उसे याद आया वह दिन जब एकदिन रमा अपनी प्रिय सहेली वंशिका के घर गई थी और वहीं उसका सामना वंशिका की बेटी कशिका से हो गया। कशिका को उसी दुपट्टे से ढ़के चेहरे वाले रुप में तैयार देखकर रमा अपने को रोक नहीं पायी, बोली," कशिका बेटी, ये क्या, तुम लोग पूरे हाथों को दस्तानें से और दुपट्टे से अपने मुँह को ढ़ककर निकलती हो। बिलकुल अच्छा नहीं लगता है। सिर्फ तुम्हारी बड़ी-बड़ी आँखें ही चमकती व घूरती हुई नजर आती है। यह कैसा फैशन है, जिसमें अपने ही अपनों को पहचान न सकें। अगर आज ही तुम मुझसे बाहर सड़क पर मिलती, तो मैं तुम्हें पहचान भी नहीं पाती। क्या जमाना आ गया है?"
यह सुनकर कशिका बोली," आँटी, आप भी ना। कभी आप भी ऐसे ही हाथ-मुँह ढ़ककर बाहर निकलिए, फिर देखिए धूल धक्कड़ों और धूप जैसे बहुत से परेशानियों से बहुत आराम मिलता है। आप भूल जायेंगी, मुँह खोल कर चलने के लिए।"
" तुम्हारा तर्क ठीक होगा। पर पसंद नहीं आता है।" रमा मन की खिज उतार कर चुप हो गई।
" मैं आपकी बातों से सहमत हूँ, आँटी। पर आराम के आगे पसंद फीकी पड़ जाती है। समय के माँग के अनुसार अपने को बदलना भी तो जरुरी होता है।" कशिका अपनी बात के समर्थन में तर्क देकर बोली।
 रमा बात को आगे नहीं बढ़ायी पर जीवन के अनुभवों से उसने एक चीज गाँठ बाँध लिया था कि जिन चीजों से हमेशा चिढ़ो, वही चीजें कभी ना कभी अपनाना जरुर पड़ता है। चेहरा ढ़ककर चलने वाली लड़कियों से चिढ़ने वाली रमा आज मुँह पर मास्क, आँखों पर चश्मा और सर पर पल्लू से ढ़के चेहरे में अपना अक्श आधुनिकता के दौर में मुँह छुपाकर चलने वाली लड़कियों से सामंजस्य बैठाकर अपने मन में बसी घृणा को पीछे ढ़केल कर आधुनिकता की नयी मांग की प्रमाणिकता को खुशी मन से स्वीकार करके कोरोना माहौल में बाहर जाने की जुर्रत स्वीकार कर ली।

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