कम्फर्ट जोन (लघुकथा)

रमोला के बेटा को लोग नये व बड़े मकान में जाने की बधाइयाँ दे रहे थे। बेटा भी खुशी मन से माँ के पास आकर अपनी खुशी अपनी माँ से साझा करते हुए बोला," माँ,अभी तक इस छोटे से घर में सबका दम घुटता था, क्योंकि यहाँ कहीं भी किसी के लिए कोई भी अपना कम्फर्ट जोन नहीं था। सब खिचड़ी की तरह एक ही कमरे में घुसे पड़े रहते थे। इसी लिए दुखी थे। अब नये घर में सबकी यह शिकायत दूर हो जायेगी। वहाँ सबका अपना-अपना एक-एक कम्फर्ट जोन होगा। माँ, वहाँ तुम्हारा भी एक अलग कमरा है... बिलकुल अलग...तुम्हारा कम्फर्ट जोन। अब तो तुम भी खुश हो ना।"
बेटा रमोला को यह सब्ज बाग दिखाकर चला गया, पर रमोला के लिए यह अजीब कशमकश भरी दुविधा थी...कि वह हँसे या रोये। क्योंकि एक ही कमरे में बच्चों और परिवार के संग घुसड़-मुसड़कर चहल-पहल व खुशहाली वाली रंगीन जीवन बिताने वाली रमोला को नये मकान के कम्फर्ट जोन में वह खुद को कम्फर्ट महसूस करेंगी या वह बिलकुल अकेली असुरक्षित पड़ जायेगी।....यह उसके सोच से परे था।

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