नयी सोच में ढ़लती माँ (लघुकथा)

ममता की बेटी कोमल दूसरी बार लेवर रुम में भर्ती थी। कोमल की पहली संतान उसकी नन्हीं बेटी पारुल थी। जिंदगी में सही सामंजस्य बैठाने के लिए बेटा और बेटी दोनों की अपनी-अपनी महत्ता एवं जरुरत है। इसी सोच के तहत ममता की इच्छा थी कि बेटी कोमल को इस बार बेटा हो जाता, तो उसका परिवार संतुलित हो जायेगा।
अंतर्मन से पुत्र रत्न की कामना करने वाली ममता बार-बार बगल में बैठी समधिन आकांक्षा जी को निहार रही थी। आकांक्षा जी शांत व संतुलित बैठी दिख रही थी। दामाद जी उनके इकलौते पुत्र थे। वंश बेल को बढ़ाने वाला बेटा ही चाहिए... ऐसी घबड़ाहट वाली कोई चिंता या सिकन उनके मुखमण्डल पर परिलक्षित नहीं हो रहा था।
थोड़ी देर बाद अंदर से सिस्टर एक नन्हीं बच्ची को लेकर आयीं। परिवार के सभी लोग लगभग दौड़ते हुए वहाँ पँहुचे, तो सिस्टर नन्हीं बच्ची को दादी की गोद में देती हुई बोली," बधाई हो, पोती हुई है।"
दादी पोती को गोद में लेकर निहारती हुई बहुत खुश व संतुष्ट नजर आ रही थी। ममता के साथ सभी ने बच्ची को  दादी के गोदी में देखा और प्यार किया। अभी-अभी नयी दीदी बनी पारुल भी अपनी छोटी बहन को देखकर बहुत उत्साहित थी। सिस्टर के जाने के बाद आकांक्षा जी अपने बेटा से बोली," जाओ, मिठाई लेकर आओ।"
थोड़ी देर में ममता के पति दामाद जी के साथ मिठाई लेकर आ गये। आकांक्षा जी ने परिवारी जनों और वहाँ बैठे लोगो का मुँह मीठा कराया।
आकांक्षा जी की सौम्यता ने ममता के मन को छू लिया। जो बेचैनी,संकुचित व संक्रीण विचार ममता के मन में पनप रही थी, वह आकांक्षा जी की खुशी व संतुष्टि की वजह से एकदम गायब हो चुकी थी।
उसी समय बगल में बैठी एक बुजुर्ग महिला अपने बगल की महिला से फुसफुसाई,बोली," इकलौते बेटा को दूसरी बार लड़की पैदा होने पर किसी माँ को इतनी खुश पहली बार देख रही हूँ।" महिला ने बुजुर्ग को ठोकते हुए कहा," चुप रहो। कोई सुन लेगा।" पर उनकी फुसफुसाहट ममता ने सुन लिया था। ममता को अपने ऐसे दामाद और समधिन पर गर्व हुआ, जो पुरानी मान्यताओं एवं परम्पराओं से परे हटकर एक नयी सोच की ओर ढ़लते नजर आ रहे थे। अब ममता भी अपने तंग विचारधारा वाले खोल से बाहर निकलकर खुश व संतुष्ट थी।

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शंखनाद (कविता)