बुजुर्ग का टोकना (संस्मरण)

मैं और मेरी रागिनी दीदी लखनऊ के एक कालेज के हॉस्टल में रह कर शिक्षा ग्रहण कर रहे थे। हमारा परिवार गोरखपुर के बाँसगाँव तहसील में रहता था। उस समय सफर अधिकतर स्लिपर क्लास में ही होता था। शुरू में पापा हमें छोड़ने लखनऊ आते थे, पर उसके बाद हम दोनों बहने स्वयं ही आने-जाने लगे। अकेले सफर से भटक भी खुलने लगा था। जिसके कारण हम हर छुट्टी में बिंदास घर आने-जाने लगे।
यात्रा के मध्य हमारी नजरें अक्सर उन लड़कों की ओर आकर्षित होता था, जो बिंदास दरवाजे के पास खड़े या बैठकर सफर करते थे। मैं उन्हें देखती और ठंड़ी हवा के झोंकों की सुखद अनुभूति से स्वयं को सिंचित महसूस करती थी। तभी तो हमारी ललक भी उसी तरह सफर का आनंद लेने को लालायित रहता था।
सफर में हम बंदिशों से मुक्त थे। अतः एक सफर में जब दरवाजे पर कोई नहीं था, तब मैंने दीदी से कहा," दीदी, चलिए। हम भी दरवाजे के पास खड़े होकर सफर का आनंद लेते है।"
दीदी मान गई। हम दोनों बहनें कुछ देर दरवाजे के पास खड़े रहे। धड़कते मन में जब थोड़े हिम्मत का संचार हुआ तब हम दरवाजे पर पैर लटकाकर बैठ गये। हमें बहुत अच्छा लगने लगा। 
उसी समय दो अनजान लड़के आकर पीछे खड़े हो गये। हमें लड़को से भय लगने लगा, पर ठंड़ी हवा का मोह न छोड़ पाने के कारण हम वहीं जमे रहे। तभी पीछे से अचानक एक बुजुर्ग चिल्लाये,"बहुत कर ली, तुम दोनों ने अपनी मनमानी। अब चुपचाप आकर सीट पर बैठ जाओ।"
इस अप्रत्याशित डॉट से हम सहम गये। इसलिए हम चुपचाप आकर सीट पर बैठ गये। बुजुर्ग बोले," माँ-बाप के छूट का गलत फायदा नहीं उठाना चाहिए। यदि अभी कुछ गलत हो गया, तो उसका जिम्मेदार कौन होगा?"
अनजान बुजुर्ग की डॉट उचित था। गलती हमारी थी। हमने नजरें झुकाकर अपनी गलती स्वीकार कर ली।
बुजुर्ग ने हमें भटकने नहीं दिया, वरना हमारी गलतियों का अंजाम कुछ भी हो सकता था। जिस तरह बोगी के दरवाजे पर बैठकर ठंड़ी हवा के सुखद अनुभूति  स्मृतिपटल पर अंकित है, उसी तरह हम उस बुजुर्ग के क्रोध के भी आभारी है, जिन्होंने अपने सामने हो रहे गलत कार्य को रोकना अपना कर्तव्य समझा। और हम पर अपना गुस्सा दिखलाकर हमें सही-गलत का पहचान कराया।
बुजुर्गों का टोकना कभी-कभी बहुत नागवार लगता है, पर कभी-कभी बुजुर्गो के टोकने से जिंदगी में जो नया मोड़ आ जाता है, जिसे हम कभी भूल नहीं पाते है। यह संस्मरण न भूलने वाली कड़ी ही है, जिसके कारण हम उस अनजान बुजुर्ग के टोकने को भूल नहीं पाते है।

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