समझदारी का प्रभाव (लघुकथा)

मोहिनी अपने पति दीपांश और सास शशि से किसी बात पर खुन्नस खा के बैठी थी। उसका गुस्सा मन ही मन में उबाल के चरम सीमा पर था। वह उबलकर बिखरना चाह रही थी। थोड़ी देर में दीपांश को सामने पाकर वह उबल ही पड़ी। दोनों में  बीती बातों को लेकर तीखी नोंकझोंक और बहस होने लगी। नोंकझोंक के कर्कश अस्फुट स्वर दूसरे कमरे में बैठी शशि के कानों से भी टकरा रहा था, पर वह यह सोचकर खामोश सी बैठी थी कि पति-पत्नी का आंतरिक रगड़ा है अपने आप सुलझ जायेगा।
थोड़ी देर बाद दीपांश उठकर शशि के कमरे में आ गया, तो मोहनी भी कमरे में आ गई। तू-तू,मैं-मैं की बकवास भरी बरसात के छींटे जो अभी तक दूर से शशि पर पड़ रहा था, वह अब शशि के कमरे में बरसने और उसे भिगोने लगा। दीपांश की खामोशी से खुन्नस खाकर मोहिनी ने अपना रुख शशि की तरफ कर लिया। 
दीपांश नहीं चाहता था कि माँ इन बेतुकी बातों में फँसे। वह तैश में मोहिनी को चुप कराने लगा, तब शशि मुखरित होकर दीपांश को चुप कराते हुए बोली," तुम चुप रहो। मुझे मोहिनी के मन का गुबार सुनने दो।" फिर वह मोहिनी से बोली," हाँ बोलो मोहिनी, तुम क्या कह रही थी? तुम्हारी बातें सुनने को अब मैं तैयार हूँ।"
मोहिनी बकबक करके अपने मन का गुबार निकालने लगी। शशि जानती थी कि लीव-इन रिलेशनशिप में रहने वाले बेटा और उसकी सहयोगी मोहिनी को एक सम्मानजनक व्यवस्थित वैवाहिक व सुंदर पारिवारिक जीवन देने के लिए उन्हें कितने पापड़ बेलने पड़े थे। पर ऐसी बातों का कोई अंत नहीं होता है। ऐसी बातों को जिसमें एक दूसरे की जिम्मेदारियों को समझने या दोषारोपण लगाने की गुत्थी को जितना सुलझाने की कोशिश करो...वह उतनी ही उलझती है। इसलिए शशि सीधी व सरल भाषा में बोली," बस, इतनी सी ही बात थी? अरे, मैंने तो तुम लोगो के लिए कभी कुछ किया ही नहीं और न कभी कुछ भविष्य में करने का इरादा ही है। मैंने तो जो कुछ भी किया या करुंगी...वह अपनी खुशी या अपनी संतुष्टि के लिए था। अब तुम्हारी जिंदगी व्यवस्थित है और तुम  दोनों की अपनी है। इसलिए इसे अपने तरीका से जिओ...मौज करो या कलह में व्यतीत करो। अब यह तुम दोनों समझना है। मैं तो अपने पोता व पोती में व्यस्त व मस्त हूँ, वैसे तुम्हें आज इस समय की कोई परेशानी है, तो वह बताओ। मैं उसका निराकरण अभी कर दूंगी ।"
यह सुनकर मोहिनी चुप हो गई, क्योंकि इसका प्रत्युत्तर उसके पास कुछ था ही नहीं। वह बोली," ऐसी बात है, तब आपसे शिकायत करने का कोई उद्देश्य बनता ही नहीं है।" यह कहकर मोहिनी शांत मन से अपने कमरे में चली गई। घंटों की बकवास शशि की समझदारी की वजह से पल भर में ही सुलझकर छूमंतर हो गई।
थोड़ी देर बाद मोहिनी फिर शशि के कमरे में आई और शशि से बोली," मम्मी जी, इण्डिया गेट घूमने का मन कर रहा है, चलेंगी।"
शशि ने स्वीकृति दे दी। इसके बाद शशि बेटा-बहू और उनके दोनों बच्चों के साथ तैयार हो कर इण्डिया गेट घुमने चली गई। और फिर पूरी शाम मस्ती मारकर वोटिंग और खा पीकर खुशनुमा माहौल में पूरा परिवार वापस आ गया।
शशि की समझदारी की वजह से लग ही नहीं रहा था कि घूमने जाने से पहले यहाँ बातों का कोई बवंडर भी उठा था।

No comments:

शंखनाद (कविता)