दीदी डॉक्टर मै मरीज (लघुकथा)

रमा अपने दोनों छोटे बच्चों अवनी और अथर्व के साथ मस्ती भरी बातें करने में व्यस्त थी। दोनों बच्चों का आपस में बहुत प्यार था। एकदिन अचानक अवनी बोली," मम्मी, जब आप छोटी थी, तब आप बड़ी होकर क्या बनना चाहती थी? आप ने जो सोचा था, वह हमें बताईये।"
रमा बोली," मैं तो बस यूं ही पढ़ती हुई आगे बढ़ती रही। कभी सोचा ही नहीं कि आगे चल कर क्या करुंगी? पढ़ाई पूरी हुई तो शादी हो गयी। फिर तुम दोनों प्यारे बच्चों की मम्मी बन गई। अच्छा अवनी, तुम बताओ, तुम बड़ी होकर क्या बनना चाहती हो?"
अवनी बोली," मैं तो डॉक्टर बनना चहती हूँ। डॉक्टर बनुंगी, फिर आप लोगों के सेवा के साथ ही दूसरे लोगो की भी सेवा करुंगी।"
" वाह, तुम्हारी सोच तो बहुत अच्छी है। अच्छा अथर्व, अब तुम बताओ। बड़े होकर तुम क्या बनोंगे?"
अथर्व दोनों की बातें बहुत ध्यान से सुन रहा था। वह चहककर तुरंत बोला," मम्मी मैंने सोच लिया है कि मैं बड़ा होकर क्या बनुंगा? बड़ा होकर तो मैं अपने डॉक्टर दीदी का मरीज ही बनुंगा। और दीदी के साथ ही उनका मरीज बनकर रहूंगा।"
"दीदी के मरीज?" रमा आश्चर्य से बोली। फिर जोर-जोर से हँसने लगी। हँसते हुए ही वह फिर बोली," दीदी का पीछा बड़े होकर भी नहीं छोड़ने का इरादा है। इतना प्यार करते हो अपनी दीदी से?"
इतना सुनते ही अथर्व बोला," हाँ, करता तो हूँ। पर पापा से मत बताईयेगा। वरना वे हँसेंगे।"
"तुम्हारी बचपने वाली सोच पर हँस तो मैं भी रही हूँ।" रमा अथर्व के बालों को सहलाती हुई बोली।
"आप के हँसने से कुछ नहीं होगा।" यह कहकर अथर्व माँ की गोद में शरमाकर छुप गया।
भाई-बहन का रिश्ता अटूट होता है, क्योंकि भाई-बहन के प्यार का संबंध तब अंकुरित होते है जब दुनिया के किसी भी समझ से वे अनजान होते है। बचपन में अंकुरित होकर पल्लवित होने वाला यह संबंध सिर्फ प्यार और विश्वास की मजबूत डोर से बँधे और गुथें होते है। तभी यह निश्छल व निस्वार्थ होता है।

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