एक वोट की कीमत (बाल कहानी)

लल्ली स्कूल वैन से उतरते ही माँ सलोनी के पास दौड़ती हुई आ गई, फिर बोली," माँ, कल मेरे स्कूल में छुट्टी है। मैम कह रही थी कल वोटिंग का दिन है। सभी लोगों के घर से लोग वोट डालने जायेंगे। वे कह रही थी कि तुम्हारा स्कूल भी वोट डालने का केंद्र बनेगा। तुम लोग भी अपने माँ-पापा के साथ वोट डलवाने जाना ताकि तुम्हें भी अच्छी जानकारी मिल सके।"
"हाँ बेटी, कल हम लोग भी वोट डालने जायेंगे। तुम सुबह जल्दी उठ जाना। ये नहीं कि छुट्टी है तो देर तक सोती रहो।" सलोनी लल्ली को समझाती हुई बोली।
'चुनाव-चुनाव-चुनाव' लल्ली चुनाव का शोर रोज टीवी पर सुन-सुनकर घबड़ा चुकी थी। उसे इस चुनाव के कारण अपना मनपसंद चैनल देखने को नहीं मिलता था, इसलिए वह कुपित होकर सलोनी से पूछती थी," मम्मी, यह चुनाव क्या होता है? इसका बोरिंग हो-हल्ला कब समाप्त होगा?"
"बेटी, इसे बोरिंग और उबाऊ मत कहो। यह देश का बहुत बड़ा संवैधानिक कार्य है। जो नियत समय पर देश में संपन्न कराया जाता है। जिसमें प्रत्येक नागरिक बढ़ चढ़कर हिस्सा लेता है। जिस दिन यह चुनाव प्रक्रिया समाप्त हो जाएगा और गणना के बाद परिणाम घोषित हो जायेगा, उसी दिन चुनाव की गहमागहमी समाप्त हो जायेगी। तब  चुने गये सांसदों का शपथग्रहण समारोह होगा। और संसद का गठन हो जायेगा। इन सांसदों पर राष्ट्रहित में ठोस निर्णय ले कर कार्य को सुचारू रूप से संपन्न कराने की जिम्मेदारी होती है।" सलोनी लल्ली को समझाते हुए बोली।
"मम्मी,वोट डालने क्या मैं आप मुझे साथ ले जाएंगी? यदि ऐसा संभव है, तो मैं भी आप के साथ वोट डालने चलूँगी।"
"ठीक है, चलना। पर इसके लिए तुम्हें जल्दी जागना पड़ेगा, क्योंकि मैं जल्दी ही चली जाऊंगी।"सलोनी लल्ली को जागरूक करते हुए बोली।
"ठीक है, अभी मैं खेलने जा रही हूँ। लौटकर आऊंगी तो जल्दी सो जाऊंगी।" यह कहकर लल्ली खेलने चली गयी।
लाख कोशिशों के बाद भी जब सुबह लल्ली की नींद देर से खुली तो वह यह देखकर दंग रह गई कि उसके मम्मी-पापा वोट डालने जा चुके थे।
लल्ली,दादी कुमुद के पास पँहुचकर रोती हुई बोली," दादी, मम्मी मुझे वोट डालने के लिए ले नहीं गई। मैं जाती, तो मैं भी वोट डालती। अब मैं अपना वोट कैसे डालूंगी?"
कुमुद लल्ली को समझाते हुए बोली," बेटी, तुम अभी बहुत छोटी हो। इतने छोटे बच्चे वोट नहीं डालते है।"
"दादी, तो क्या मैं कभी वोट नहीं डाल पाऊंगी ?" लल्ली रुआँसी होकर बोली।
"जब तुम18 साल की हो जाओगी,तब तुम्हें वोट डालने का अधिकार मिलेगा। तब तुम्हारा पहली बार वोटर आईडी कार्ड बनेगा।"
"दादी, ये चुनाव क्यों आता है? मैं पहली बार चुनाव की चर्चा सुन रही हूँ। इस चुनाव के कारण पापा और भैया हर समय टीवी से चिपके रहते है। यह इतना महत्वपूर्ण क्यों है? हमें इससे क्या फायदा होगा?"
"लल्ली, हमारा देश लोकतांत्रिक देश है। अतः यँहा सभी जिम्मेदार जनता का मौलिक अधिकार है कि वह अपने द्वारा चुने गये प्रत्याशी को ही सदन में भेजे। चुने गये प्रत्याशी पाँच साल के लिए मनोनीत हो जाते है। फिर जिस दल का बहुमत होता है, वह अपने नेता का चुनाव करता है। ये सभी सदस्य मिलकर देश के संचालन का काम करते है। हमारे द्वारा चुने गए सदस्य योग्य और शिक्षित हो , तभी देश का संचालन सही तरीका से होगा। तभी हमें वोट जरूर डालना चाहिए। वोट के द्वारा हमें अपनी जिम्मेदारी का बोध होता है कि हम अपने मनपसंद ,सुयोग्य और कर्मठ प्रत्याशी को ही सदन में भेजे।"
"दादी, यदि जनता किसी भी प्रत्याशी को वोट नहीं डाले तो क्या होगा?"
"बेटी, यदि हम वोट नहीं डालेंगे तो इसका अर्थ यह हुआ कि हम अपने संवैधानिक अधिकार की उपयोगिता को समझे ही नहीं। और अपने मनपसंद प्रत्याशी का चयन किए ही नहीं। जबकि वोट का अधिकार हमें मिला हुआ है। हमारे वोट न डालने से उसके गलत उपयोग होने का भी संकट बना रहता है। दबंग लोग उन वोटो का गलत तरीका से अपने पक्ष में उपयोग कर लेते है। जिसके कारण योग्य प्रत्याशी के चयन पर दुष्प्रभाव पड़ता है। इसलिए एक-एक वोट की कीमत होती है।"
"दादी, वोट डालने का कोई अधिकतम सीमा होती है।" लल्ली उत्सुकतावश पूछी। 
तब कुमुद बोली," वोट डालने की कोई अधिकतम सीमा नहीं होती है। व्यक्ति जब तक जिंदा है, अपने मताधिकार का प्रयोग कर सकता है। जब तक तुम्हारे बाबा जीवित थे, वे मुझे वोट डलवाने जरुर लेकर जाते थे। पर 18 साल से कम उम्र के बच्चे वोट नहीं डाल सकते है।"
"दादी, फिर आज आप वोट डालने क्यों नहीं गई? इस तरह तो आप अपने मताधिकार से वंचित रह जायेगी। मम्मी पापा न आपको ले गये और न मुझे। यह उनकी बहुत बड़ी भूल है। जब ऐसे पढ़े-लिखे सभ्रांत परिवार में एक वोट के कीमत की अवहेलना हो रही है, तो गाँव में तो इससे भी बहुत अधिक जागरूक करने की बहुत बड़ी जिम्मेदारी बनती है। अब समझ में आया कि मैम क्यों कह रही थी कि उन्हें गाँव जाकर अपने गाँववासियों को वोट डालने के लिए जागरूक करना है। ऐसे संवैधानिक अधिकार वाले स्थल का महत्व देखने, समझने और वँहा का लुफ्त उठाने के लिए हम जैसे बच्चों को भी वँहा जाना बहुत जरुरी है ।"   
"बेटी, मैं बुढ़ी हो गई हूँ। मैं वोट डालने नहीं जा पाऊंगी। इसीलिए बेटा-बहू मुझे लेकर नहीं गये है। मैं तो पिछली बार भी चुनाव में वोट डालने नहीं गई थी।"
"दादी, इस बार मैं आप को लेकर वोट डलवाने जाऊंगी। वोट मेरे स्कूल में ही पड़ रहा है। आप बस चलने के लिए तैयार हो जाईये।"
दादी के नानुकुर की परवाह किए बगैर लल्ली दादी का मोबाईल लेकर अपने वैन वाले भैया को फोन की और उनसे सारी बातें बताकर आने का अनुरोध की, तो वे आने को तैयार हो गए।
लल्ली दादी का वोटर आईडी कार्ड लेकर अपने स्कूल के वैन से वहाँ पँहुच गई। 
स्कूल में लल्ली के मम्मी-पापा लल्ली को दादी के साथ देखकर पहले तो घबड़ा गये। पर जब लल्ली ने बताया कि उसके स्कूल में एक एक वोट की महत्ता कितनी अधिक है, यह समझाया गया था। इसीलिए उसकी दादी का वोट बेकार न जाए और दादी भी अपने मूलभूत अधिकार का उपयोग कर सकें । इसलिए वह दादी को साथ लेकर आई है। 
लल्ली के मम्मी पापा को लल्ली के इस कृत्य से अति प्रसन्ता का अनुभव हुआ। उन्होंने कुमुद को साथ न लेकर आने के लिए कुमुद से माफी मांगी। 
कुमुद वोट डालने के बाद बहुत खुश नजर आ रही थी। उनकी संतुष्टि देखकर लल्ली को भी बहुत खुशी हुई। कुमुद को जो भी मिलता वे उससे अपनी पोती लल्ली की प्रशंसा करने से चुकती नहीं थी।
पास-पड़ोस का परिवार भी कुमुद के चेहरे की खुशी, संतुष्टि और चमक देखकर बहुत खुश था। वे लल्ली के तारीफों के पूल बाँधने लगे। लल्ली भी दादी का अंगुली थामकर चलते हुए बहुत गर्व महसूस कर रही थी, जैसे उसने देशहित में बहुत बड़ा महान कार्य किया हो।
लल्ली के इस सराहनीय कार्य की सूचना जब उसके स्कूल पहुँची तो उसकी प्रधानाचार्य महोदया प्रार्थना स्थल पर उसकी प्रसंशा की, तो बच्चों ने भी ताली बजाकर उसके कार्य की सराहना में अपना समर्थन शामिल किया।        

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